छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट में गंभीर आरोपों पर सुनवाई जारी
मामले में 2 याचिकाएं पहले से दायर की गई थीं। सोमवार को राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा की याचिका भी इसमें जोड़ दी गई है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
देश की राजधानी दिल्ली में संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की गंभीरता से समीक्षा कर रही है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, नागपुर और बिहार सहित कई राज्यों में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और उन पर हुई पुलिसिया कार्रवाई से जुड़ा हुआ है।
याचिकाओं में पुलिस पर गंभीर हिंसा के आरोप
अदालत के समक्ष पेश की गई याचिकाओं में पुलिस बल पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान उल्लेख किया कि एक 19 वर्षीय छात्र की आंख में पैलेट गन का छर्रा लगने से उसकी रोशनी चली गई है। इसके अलावा, प्रदर्शनकारियों पर इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल, कीलों वाली लाठियों से हमला करने और एक महिला प्रदर्शनकारी के गंभीर रूप से घायल होकर आईसीयू में भर्ती होने जैसे भयावह दावे किए गए हैं। याचिकाओं में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों द्वारा हिंसा करने और एक पत्रकार के साथ बेरहमी से मारपीट किए जाने का भी जिक्र है।
इससे पहले सोमवार को हुई सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि केवल विरोध प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस की ज्यादती या लाठीचार्ज को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, पीठ ने यह भी माना कि पुलिसकर्मियों पर हमले होना भी एक चिंता का विषय है। कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि इस मामले में सरकार से विस्तृत जवाब मांगा जा सकता है।
20 जुलाई के संसद मार्च का घटनाक्रम
विवाद की शुरुआत 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद तक हुए मार्च के दौरान हुई। सुबह से शाम तक चले इस प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार झड़पें हुईं। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़कर कर्तव्य पथ और विजय चौक होते हुए संसद के करीब पहुंचने का प्रयास किया था। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। इस पूरे घटनाक्रम में 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। देर रात तक जंतर-मंतर पर तनावपूर्ण स्थिति बनी रही थी।
यह आंदोलन करीब 36 दिनों तक चला, जिसकी शुरुआत नीट पेपर लीक के मुद्दे को लेकर हुई थी। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद यह प्रदर्शन समाप्त हुआ। इस दौरान सोनम वांगचुक भी छात्रों के समर्थन में अनशन पर बैठे थे, जिन्होंने सरकार से आश्वासन मिलने के बाद अपनी भूख हड़ताल समाप्त की।
सुप्रीम कोर्ट में पहले भी उठी हैं आवाजें
यह पहली बार नहीं है जब इस आंदोलन से जुड़ी याचिकाएं शीर्ष अदालत पहुंची हैं। इससे पहले भी विभिन्न वकीलों द्वारा पुलिस कार्रवाई की जांच और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए याचिकाएं दायर की गई थीं। हालांकि, पिछली सुनवाइयों के दौरान कोर्ट ने वीडियो साक्ष्यों को देखने के बजाय कानूनी प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही थी। अब जबकि राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा की याचिका को भी इस मामले में शामिल कर लिया गया है, उम्मीद है कि अदालत इस पर व्यापक रुख अपनाएगी।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!