पंचकूला कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व विधायक की बेटी द्वारा दर्ज छेड़छाड़ का मामला खारिज, बुजुर्ग आरोपी बरी
पंचकूला की एक अदालत ने पड़ोसियों के बीच पेड़-पौधे लगाने को लेकर शुरू हुए विवाद में दायर छेड़छाड़ और पीछा करने (Stalking) के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपी 70 वर्षीय बुजुर्ग श्री निवास वशिष्ठ को सभी आरोपों से बरी करते हुए साफ किया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) संदेह से परे अपना मामला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

पौधों के विवाद ने लिया कानूनी मोड़
पंचकूला की एक अदालत ने पड़ोसियों के बीच हुए विवाद से जुड़े छेड़छाड़ और पीछा करने के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विनोद कुमार की अदालत ने 70 वर्षीय बुजुर्ग श्री निवास वशिष्ठ को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। यह मामला एक पूर्व विधायक की बेटी द्वारा दर्ज कराया गया था, जिसमें मुख्य विवाद घर के बाहर लगाए गए पौधों और उनकी शाखाओं को लेकर शुरू हुआ था।
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी बुजुर्ग उनके घर के बाहर लगे पौधों को लेकर उन्हें परेशान करते थे। महिला के अनुसार, जब वह बाहर निकलती थीं तो बुजुर्ग उन पर फब्तियां कसते थे और अश्लील गाने गाते थे। उस समय महिला गर्भवती थीं, जिसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत की और सेक्टर-5 पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।
अदालत ने किन आधारों पर सुनाया फैसला
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाद की जड़ सरकारी जमीन पर लगे पौधे थे, जिनकी शाखाएं आरोपी के घर के रास्ते में बाधा डाल रही थीं। इन पौधों को हटाने की मांग को लेकर हुए विवाद के बाद ही यह आपराधिक मामला दर्ज करवाया गया था।
न्यायालय ने अपने आदेश में बयानों में विरोधाभास का भी उल्लेख किया। शुरुआती शिकायत में यौन उत्पीड़न या अश्लील गानों का कोई जिक्र नहीं था, जबकि तीन महीने बाद दिए गए 164 के बयानों में इन आरोपों को जोड़ा गया। कोर्ट ने इसे बयानों में सुधार और बदलाव की प्रक्रिया माना, जो मामले की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
इसके अतिरिक्त, महिला की शैक्षणिक योग्यता का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक उच्च शिक्षित महिला होने के बावजूद, दो साल तक कथित प्रताड़ना सहने के बाद भी उन्होंने स्थानीय पुलिस या किसी अन्य स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। यह देरी और अचानक से नए आरोपों का जुड़ना मामले को संदेहास्पद बनाता है।
सबूतों का अभाव और राजनीतिक रसूख की संभावना
जांच के दौरान पुलिस कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। न तो कोई सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध था और न ही कोई स्वतंत्र गवाह सामने आया जो महिला के आरोपों की पुष्टि कर सके। जांच अधिकारी भी घटना की कोई निश्चित तारीख या समय दर्ज करने में असमर्थ रहे। मौखिक आरोपों के अलावा केस में कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं था।
अदालत ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता के पूर्व विधायक की बेटी होने के कारण राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर मामला दर्ज कराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बिना किसी ठोस साक्ष्य के केवल मौखिक बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इसी आधार पर कोर्ट ने बुजुर्ग को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!