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वोटर लिस्ट से नाम हटने पर सरकारी लाभ बंद न करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और बंगाल सरकार को भेजा नोटिस

Supreme Court seeks response on voter list removal impact on government schemes. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस मामले में चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 25 जुलाई से पहले हो सकती है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

17 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें 1.2K
वोटर लिस्ट से नाम हटने पर सरकारी लाभ बंद न करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और बंगाल सरकार को भेजा नोटिस
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वोटर लिस्ट से नाम हटने पर सरकारी योजनाओं के लाभ का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब तलब किया है। यह मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि केवल मतदाता सूची से नाम कट जाने के आधार पर किसी नागरिक को राशन, अन्नपूर्णा योजना या अन्य सरकारी लाभों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की खंडपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई 25 जुलाई से पहले निर्धारित करने के संकेत दिए हैं, ताकि प्रभावित लोगों को हो रही परेशानियों का जल्द समाधान निकाला जा सके।

याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें और नागरिकता का विवाद

याचिकाकर्ता प्रसेंजित बोस की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को अवगत कराया कि नागरिकता से संबंधित करीब 34 लाख मामले अभी भी लंबित हैं, जिनमें से अब तक केवल 38 हजार मामलों का ही निपटारा हो पाया है। वर्तमान में राज्य में मात्र 19 ट्रिब्यूनल कार्यरत हैं, जो इन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। याचिका में मांग की गई है कि ट्रिब्यूनलों के कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए और उनके सभी आदेशों व नियमों को सार्वजनिक किया जाए।

याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जब तक किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर अंतिम कानूनी फैसला नहीं आ जाता, तब तक उसे मिलने वाली सरकारी सहायता को बंद करना अनुचित है। वकील ने तर्क दिया कि जिन लोगों के पास पासपोर्ट जैसे वैध दस्तावेज मौजूद हैं, उनसे बार-बार नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग करना उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान करना है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और चुनाव आयोग की भूमिका

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह निर्धारित कर चुका है कि चुनाव आयोग का प्राथमिक कार्य केवल मतदाता सूची तैयार करना और चुनाव प्रक्रिया का संचालन करना है। किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो यह मामला चुनाव आयोग के बजाय संबंधित सरकारी प्राधिकरण या सक्षम ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाना चाहिए। यह टिप्पणी इस मामले में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है, क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ नागरिकता का स्वतः निरस्त होना नहीं माना जा सकता।

प्रभावित वर्ग के लिए भविष्य की राह

इस मामले की सुनवाई का सीधा असर उन हजारों लोगों पर पड़ेगा जो वर्तमान में अपनी नागरिकता सिद्ध करने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। सरकारी योजनाओं से वंचित होने के कारण इन लोगों के जीवनयापन पर गहरा संकट मंडरा रहा है। अदालत के हस्तक्षेप से अब यह उम्मीद जगी है कि जब तक नागरिकता का अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक उन्हें मिलने वाले राशन और अन्य कल्याणकारी लाभों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकेगी।

आगामी सुनवाई में चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दिए जाने वाले जवाब पर सभी की निगाहें टिकी हैं। अदालत का रुख यह तय करेगा कि क्या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदलाव करके इन लोगों को राहत दी जाएगी या फिर नागरिकता के लंबित मामलों के निपटारे के लिए कोई नई समयसीमा तय की जाएगी।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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