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दतिया विधानसभा उपचुनाव: राजनीतिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है भारती परिवार का दबदबा

दतिया विधानसभा उपचुनाव के साथ जिले की सियासत एक बार फिर इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ी है। आजादी के बाद यह दतिया विधानसभा का 17वां चुनाव होगा।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

21 जुलाई 20262 मिनट पढ़ें
दतिया विधानसभा उपचुनाव: राजनीतिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है भारती परिवार का दबदबा
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दतिया में 17वीं बार चुनावी रण, मतदाताओं की संख्या में भारी उछाल

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर उपचुनाव के चलते सुर्खियों में है। आजादी के बाद से अब तक इस सीट पर 17 बार चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। साल 1951 में जब विंध्य प्रदेश के अंतर्गत पहला चुनाव हुआ था, तब यहां मतदाताओं की कुल संख्या महज 9,421 थी। समय के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विस्तार हुआ और आज स्थिति यह है कि आगामी उपचुनाव में 2,20,344 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह आंकड़ा पहले चुनाव की तुलना में लगभग 2200 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि को दर्शाता है।

भारती परिवार का राजनीतिक वर्चस्व और चुनावी समीकरण

दतिया के राजनीतिक इतिहास का विश्लेषण करें तो भारती परिवार का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस परिवार ने अब तक कुल आठ बार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की है, जो क्षेत्र में उनके लंबे राजनीतिक दबदबे को साबित करता है। वहीं, भाजपा के दृष्टिकोण से देखें तो 1990 में शंभू दयाल तिवारी ने पहली बार इस सीट पर कमल खिलाकर पार्टी की नींव रखी थी। इसके बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने लगातार तीन बार (2008, 2013, 2018) जीत हासिल कर भाजपा के प्रभाव को मजबूत किया।

दतिया की राजनीति में राजपरिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। कुंवर घनश्याम सिंह ने दो बार विधायक के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। वहीं, 1993 और 2003 के चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर उनकी जीत ने क्षेत्र के चुनावी समीकरणों को नई दिशा दी। 1998 में राजेंद्र भारती ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी, जो उनके व्यक्तिगत जनाधार को दर्शाता है।

दशकों के चुनावी सफर पर नजर डालें तो 1951 और 1957 में कांग्रेस के श्यामसुंदर ने जीत की शुरुआत की थी। 1962 में निर्दलीय उम्मीदवार सूर्यदेव शर्मा ने जीत हासिल कर सबको चौंका दिया था। 1970 के दशक में भारतीय जनसंघ के गुलाबचंद कनूलाल ने 1972 में जीत दर्ज की, जबकि 1977 और 1980 में कांग्रेस ने पुनः वापसी की। 1985 में राजेंद्र भारती ने 16 हजार से अधिक मतों के अंतर से एक बड़ी जीत दर्ज की थी।

हालिया चुनाव और भविष्य की चुनौतियां

वर्ष 2023 के पिछले विधानसभा चुनाव में दतिया की जनता ने एक बार फिर बदलाव का रुख अपनाया। कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा को 7,742 मतों के अंतर से पराजित किया। इस परिणाम ने क्षेत्र में राजनीतिक संतुलन को फिर से कांग्रेस के पक्ष में मोड़ा। अब आगामी उपचुनाव के लिए सभी प्रमुख दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं।

दतिया का यह उपचुनाव न केवल नए राजनीतिक इतिहास को जन्म देगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि मतदाता किस विचारधारा को प्राथमिकता देते हैं। मतदाताओं की बढ़ती संख्या और राजनीतिक दलों की सक्रियता ने इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या भारती परिवार अपना पुराना दबदबा कायम रख पाता है या भाजपा और अन्य दल कोई नया समीकरण तैयार करते हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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