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37 साल पुराने दहेज हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन आरोपी बरी

Allahabad High Court acquits 3 in 37-year-old dowry murder case. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर के 37 वर्ष पुराने दहेज हत्या के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या के आरोप को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

6 जुलाई 20262 मिनट पढ़ें 1.3K
37 साल पुराने दहेज हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन आरोपी बरी
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37 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट से आरोपियों को मिली राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर के एक बेहद पुराने और चर्चित दहेज हत्या के मामले में अपना फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। यह मामला लगभग 37 साल पुराना है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष हत्या के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

क्या था 1986 का यह मामला

घटना कानपुर के महाराजपुर थाना क्षेत्र की है। वर्ष 1984 में विजय लक्ष्मी का विवाह राकेश कुमार मिश्रा उर्फ डॉक्टर के साथ हुआ था। आरोप था कि ससुराल पक्ष द्वारा लगातार दहेज की मांग की जा रही थी। 13 जनवरी 1986 को मृतका के भाई ने एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें दावा किया गया कि ससुराल वालों ने विजय लक्ष्मी को जबरन जहरीला पदार्थ खिला दिया, जिससे अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जिंक फॉस्फाइड नामक विष की पुष्टि हुई थी। वर्ष 1989 में ट्रायल कोर्ट ने पति, ससुर, जेठ और सास को दोषी करार दिया था।

अपील की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास है। मृतका के भाई ने जहां उसे कुछ खिलाने की बात कही, वहीं भांजे ने पानी में जहर मिलाकर पिलाने का दावा किया। अदालत ने इन विरोधाभासों को अभियोजन की कहानी के लिए घातक माना। इसके अलावा, जिंक फॉस्फाइड जैसे कड़वे जहर को बिना किसी संघर्ष के पिलाना संभव नहीं है, जबकि मृतका के शरीर पर संघर्ष का कोई निशान नहीं पाया गया था।

जांच प्रक्रिया और साक्ष्यों पर उठे गंभीर सवाल

हाईकोर्ट ने जांच की गुणवत्ता पर भी कड़े सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि विसरा के सुरक्षित रहने की श्रृंखला (Chain of Custody) को अभियोजन साबित नहीं कर सका। यह स्पष्ट नहीं था कि विसरा किसके पास रहा और उसे फॉरेंसिक लैब तक कैसे पहुंचाया गया। फॉरेंसिक लैब के किसी जिम्मेदार अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया, जिससे साक्ष्यों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत आरोपियों से विसरा रिपोर्ट और उससे जुड़ी परिस्थितियों के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा गया था। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि जिन परिस्थितियों के आधार पर दोष सिद्ध किया जाना है, उन्हें आरोपी के समक्ष रखना अनिवार्य है। ऐसा न करना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।

इन सभी कानूनी खामियों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 7 दिसंबर 1989 के फैसले को निरस्त कर दिया। राम औतार, राकेश कुमार मिश्रा और लड्डन मिश्रा को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। अदालत ने आदेश दिया कि यदि आरोपी जमानत पर हैं, तो उनके जमानत बंधपत्र समाप्त माने जाएंगे और उन्हें आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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