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अलीगढ़ हत्याकांड: 22 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीनों दोषियों को किया बरी

Aligarh murder case: Trial court verdict overturned, all evidence failed. इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अलीगढ़ के अकराबाद थाना क्षेत्र के एक हत्याकांड में जुगेंद्र सिंह, डिप्टी सिंह और रामवीर को अपराध से बरी कर दिया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

10 जुलाई 20262 मिनट पढ़ें 1.5K
अलीगढ़ हत्याकांड: 22 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीनों दोषियों को किया बरी
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दो दशक पुराने मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ के अकराबाद थाना क्षेत्र से जुड़े 22 साल पुराने एक चर्चित हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन लोगों को दोषमुक्त करार दिया है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें जुगेंद्र सिंह, डिप्टी सिंह और रामवीर को दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने इन तीनों को सभी आरोपों से बरी करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

यह मामला 9 और 10 अगस्त 2004 की दरमियानी रात का है। रिपोर्ट के अनुसार, भगवान सिंह नामक व्यक्ति की रात करीब 2:15 बजे गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतक के भाई पप्पू सिंह ने पुलिस को दी गई शिकायत में नैहना उर्फ मन्नू के साथ-साथ जुगेंद्र, रामवीर और डिप्टी पर तमंचों से हमला करने का आरोप लगाया था। उस समय इस हत्या के पीछे का कारण मृतक द्वारा एक अवैध संबंध का विरोध करना बताया गया था।

सबूतों और गवाहों की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को पूरी तरह से अविश्वसनीय माना। अदालत ने टिप्पणी की कि रात के घने अंधेरे में गहरी नींद में सोए हुए चश्मदीदों द्वारा हमलावरों को पहचान लेना संदिग्ध है। इसके अलावा, घटनास्थल पर बिजली कनेक्शन न होने और मंदिर से चोरी की बिजली के जरिए रोशनी होने के दावों को अदालत ने खारिज कर दिया, जिससे पहचान की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

न्यायालय ने मेडिकल रिपोर्ट और चश्मदीदों के बयानों में भारी विरोधाभास पाया। चश्मदीदों ने जहां दो गोलियां चलने की बात कही थी, वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल एक गोली का घाव मिला। इस विसंगति ने अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी को कमजोर कर दिया। इसके अतिरिक्त, पुलिस द्वारा बरामद किए गए तमंचों की फोरेंसिक जांच में वे हत्या में इस्तेमाल हथियारों से मेल नहीं खाए, जिससे बरामदगी की प्रक्रिया पर भी संदेह पैदा हुआ।

अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में रहा नाकाम

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। निचली अदालत ने साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना ही फैसला सुनाया था, जिसे हाईकोर्ट ने त्रुटिपूर्ण माना। हत्या के पीछे जो मकसद बताया गया था, उसे भी अदालत ने केवल सुनी-सुनाई बातों और अफवाहों पर आधारित करार दिया और इसे 'गढ़ा हुआ' बताया।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यदि तीनों अपीलकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल प्रभाव से जेल से रिहा किया जाए। 22 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद मिली इस राहत ने आरोपियों के परिवारों को बड़ी राहत दी है, जबकि इस मामले में न्याय प्रणाली की बारीकियों पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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