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बिहार में हथियारों के लाइसेंस का गोरखधंधा: बिना ट्रेनिंग के बिक रहे आर्म्स सर्टिफिकेट, 22 हजार में मिल रहा 'फिटनेस'

Bihar arms license racket exposed with fake training certificates and medical fitness. आप टेंशन मत लीजिए। पैसे जमा कीजिए, फॉर्म भरिए, हम बिना कैंडिडेट के आए ही आर्म्स ट्रेनिंग सर्टिफिकेट दे देंगे।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

31 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें 352
बिहार में हथियारों के लाइसेंस का गोरखधंधा: बिना ट्रेनिंग के बिक रहे आर्म्स सर्टिफिकेट, 22 हजार में मिल रहा 'फिटनेस'
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बिना गन चलाए मिल रहा ट्रेनिंग सर्टिफिकेट

बिहार में हथियारों के लाइसेंस के लिए अनिवार्य 'आर्म्स ट्रेनिंग सर्टिफिकेट' का एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। राज्य के विभिन्न शूटिंग ट्रेनिंग सेंटरों और राइफल क्लबों में बिना किसी व्यावहारिक प्रशिक्षण के पैसे लेकर सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं। नियम के अनुसार, लाइसेंस आवेदक को तीन दिनों तक गन चलाने की ट्रेनिंग लेनी होती है, लेकिन ये सेंटर महज कुछ घंटों की औपचारिकता और मोटी रकम के बदले इसे पूरा करने का दावा कर रहे हैं।

इन्वेस्टिगेशन में खुलासा हुआ है कि पटना, मुजफ्फरपुर और सीवान जैसे शहरों में स्थित सेंटर 22,000 से 30,000 रुपये तक की फीस वसूल रहे हैं। इन सेंटरों के कर्मचारी न केवल ट्रेनिंग सर्टिफिकेट देने का वादा कर रहे हैं, बल्कि मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट भी बिना किसी जांच के उपलब्ध करा रहे हैं। इसके लिए पहले से हस्ताक्षरित और मुहर लगे मेडिकल रिपोर्ट तैयार रखे गए हैं, जिनमें केवल आवेदक का नाम भरना बाकी रहता है।

खेल मंत्री के परिजनों का नाम आया सामने

पटना के लव-कुश टावर स्थित बिहार राइफल एसोसिएशन के कार्यालय में भी इसी तरह की धांधली की बात सामने आई है। वहां के कर्मचारियों ने दावा किया कि यह सेंटर खेल मंत्री श्रेयसी सिंह के चाचा द्वारा संचालित है। जब रिपोर्टर ने वहां संपर्क किया, तो उन्हें बताया गया कि तीन दिन की ट्रेनिंग का नियम कागजों में है, लेकिन काम एक घंटे में निपटा दिया जाएगा। यहां तक कि पंजाब जैसे अन्य राज्यों के लोगों को भी सर्टिफिकेट जारी करने की बात कही गई।

मामले पर बिहार स्टेट राइफल एसोसिएशन के सचिव और खेल मंत्री के चाचा त्रिपुरारी सिंह ने कहा कि वे इस तरह की गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि लाइसेंस के लिए तीन दिन की ट्रेनिंग अनिवार्य है और यदि कोई सेंटर नियमों का उल्लंघन कर रहा है, तो उस पर उचित कदम उठाए जाएंगे। वहीं, मंत्री श्रेयसी सिंह के कार्यालय ने इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी।

सत्यापन प्रक्रिया में भी दलाली का खेल

सेंटर संचालकों ने यह भी स्वीकार किया कि लाइसेंस प्रक्रिया के दौरान होने वाले पुलिस और प्रशासनिक सत्यापन (वेरिफिकेशन) में भी वे मदद कर सकते हैं। एक संचालक ने बताया कि यदि आवेदक अतिरिक्त पैसे खर्च करे, तो वे फाइल को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि थाना स्तर पर आवेदक को स्वयं उपस्थित होना पड़ सकता है, क्योंकि यह स्थानीय सत्यापन का मामला होता है।

मुजफ्फरपुर और सीवान के सेंटरों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। वहां के संचालकों ने बताया कि वे शूटिंग करते हुए आवेदक की फोटो खींचकर उसे ट्रेनिंग का सबूत बना देते हैं, ताकि भविष्य में किसी भी जांच के दौरान इसे वैध दिखाया जा सके। इन सेंटरों का कहना है कि वे पूरे राज्य के लिए एक ही डेटाबेस का उपयोग करते हैं, जिससे सर्टिफिकेट की प्रमाणिकता पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है।

पृष्ठभूमि और सरकारी निर्देश

यह पूरा मामला तब सामने आया जब बिहार सरकार ने पंचायत प्रतिनिधियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्हें हथियार लाइसेंस देने की प्रक्रिया को सरल और तेज करने का निर्देश दिया। सरकार ने जिलाधिकारियों को आवेदन के 60 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी करने को कहा है। इस निर्देश के बाद से लाइसेंस के आवेदनों में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसका फायदा उठाकर ये फर्जी ट्रेनिंग सेंटर सक्रिय हो गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिना उचित प्रशिक्षण के हथियारों का लाइसेंस जारी करना सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यदि कोई व्यक्ति बिना गन चलाने की जानकारी के हथियार रखता है, तो दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। फिलहाल, इस खुलासे के बाद प्रशासन के सामने इन फर्जी सेंटरों पर नकेल कसने की बड़ी चुनौती है, ताकि हथियारों के लाइसेंस की प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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