लखनऊ में सिनेमाई इतिहास का अनूठा सफर: 'बायस्कोप-2' प्रदर्शनी में 1930 के दशक की दुर्लभ यादें
अलीगंज स्थित कला स्रोत आर्ट गैलरी में शनिवार से बायस्कोप-2 गुमनाम है कोई’ प्रदर्शनी शुरू हो गईं हैं। 4 अक्टूबर तक चलने वाली प्रदर्शनी में 1930 के दशक से लेकर आज तक की फिल्मों के दुर्लभ मूल पोस्टर, पुरानी तस्वीरें और सिनेमा से जुड़ी चीजें प्रदर्शित की जा रही हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

लखनऊ के अलीगंज स्थित कला स्रोत आर्ट गैलरी में भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम अतीत को संजोने वाली एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। 'बायस्कोप-2: गुमनाम है कोई' शीर्षक से शुरू हुई यह प्रदर्शनी दर्शकों को सिनेमा की उन गलियों में ले जा रही है, जो आज की डिजिटल पीढ़ी के लिए किसी अनसुने किस्से जैसी हैं। यह आयोजन 4 अक्टूबर तक चलेगा, जिसमें फिल्म प्रेमियों को भारतीय सिनेमा के विकास के विभिन्न चरणों को करीब से देखने का मौका मिल रहा है।
दुर्लभ पोस्टरों के जरिए सिनेमा का सफर
इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता इसके दुर्लभ मूल पोस्टर और पुरानी तस्वीरें हैं। यहां 1930 के दशक से लेकर आधुनिक दौर तक की फिल्मों का संग्रह मौजूद है। प्रदर्शनी का क्यूरेशन सुबूर उस्मानी द्वारा किया गया है, जिन्होंने अपने निजी संग्रह के माध्यम से सिनेमा के इतिहास को सहेजने का प्रयास किया है। प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में अभिनेता और पटकथा लेखक अतुल तिवारी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि फिल्म इतिहासकार करण बाली ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत की।
प्रदर्शनी में शामिल पोस्टरों में 1939 की फिल्म 'कंगन', 1943 की 'राम राज्य' और 1946 की 'फ्लाइंग प्रिंस' जैसी कालजयी फिल्मों की झलक देखने को मिलती है। आयोजकों का कहना है कि 'राम राज्य' वह ऐतिहासिक फिल्म थी जिसे महात्मा गांधी ने भी देखा था। इसके अलावा, 1953 की फिल्म 'शोले' का उल्लेख भी यहां विशेष रूप से किया गया है, जो रमेश सिप्पी की 1975 की प्रसिद्ध फिल्म से काफी पहले बनी थी। इस तरह के तथ्य दर्शकों को सिनेमा के उन पहलुओं से रूबरू कराते हैं, जो इतिहास की किताबों में कहीं खो गए थे।
दूरदर्शन और सिनेमाई संस्कृति की यादें
यह प्रदर्शनी केवल पोस्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस दौर की यादें भी ताजा करती है जब सिनेमा देखना एक सामूहिक पारिवारिक उत्सव हुआ करता था। 1980 के दशक के दूरदर्शन वाले दौर की झलक यहां साफ देखी जा सकती है। हाथ से बने पोस्टर, सिनेमाघरों के बाहर टिकट के लिए लंबी कतारें और किसी फिल्म के रिलीज होने पर होने वाली हलचल को इन चित्रों के माध्यम से जीवंत किया गया है। यह उन लोगों के लिए एक भावुक अनुभव है जिन्होंने उस दौर के सिनेमा को जिया है।
संग्रहकर्ता सुबूर उस्मानी के अनुसार, एक पोस्टर महज कागज का टुकड़ा नहीं होता, बल्कि वह उस दौर की पूरी कहानी और सामाजिक परिवेश को बयां करता है। उनके निजी संग्रह में दुर्लभ किताबें, पुराने अखबार, पत्र-पत्रिकाएं और सिनेमा से जुड़ी ऐसी वस्तुएं शामिल हैं जो अब आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य भारतीय सिनेमा के उन पन्नों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है जो धीरे-धीरे विस्मृति के गर्त में जा रहे हैं।
सिनेमाई विरासत को सहेजने की पहल
लखनऊ की कला स्रोत आर्ट गैलरी में आयोजित यह प्रदर्शनी फिल्म प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरी है। यहां आने वाले लोग न केवल पुरानी फिल्मों के बारे में जान रहे हैं, बल्कि सिनेमा के तकनीकी और कलात्मक विकास को भी समझ रहे हैं। प्रदर्शनी में मौजूद हर वस्तु एक अलग कहानी सुनाती है, जो दर्शकों को उस समय के फिल्म निर्माण और प्रचार के तरीकों से परिचित कराती है।
4 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रदर्शनी में प्रवेश पूरी तरह से सिनेमाई इतिहास के प्रति समर्पित है। आयोजकों का मानना है कि इस तरह के आयोजन न केवल पुरानी यादों को ताजा करते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय सिनेमा की समृद्ध विरासत से जोड़ते हैं। यदि आप सिनेमा के शौकीन हैं और इतिहास को करीब से देखना चाहते हैं, तो यह प्रदर्शनी आपके लिए एक बेहतरीन अवसर है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!