सबरीमाला मंदिर महिला प्रवेश विवाद: धार्मिक आस्था बनाम व्यक्तिगत अधिकार

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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई एक बार फिर देश के धार्मिक और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की चर्चा का केंद्र बना हुआ है। केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को लेकर चल रही यह कानूनी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के वकील एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह तय होगा उसी समुदाय की आस्था के आधार पर। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायाधीश स्वयं यह तय नहीं करेंगे कि धर्म के लिए क्या सही है और क्या गलत। उनका तर्क है कि धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है, इसलिए किसी एक व्यक्ति के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।

इस मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए यह प्रतिबंध हटा दिया। इस फैसले के बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किए गए हैं, जिन पर अब कोर्ट में बहस चल रही है।

हाल की सुनवाई में 7 से 9 अप्रैल तक 3 दिनों तक महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। 7 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अपनी दलील में कहा कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी प्रतिबंधित है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। 8 अप्रैल को सवाल उठा कि जो भक्त नहीं हैं, वे धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे सकते हैं। 9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा।

यह मामला मूलत: संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन का प्रश्न है जो धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच तालमेल स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। एक ओर महिलाओं के समान अधिकारों की बात है तो दूसरी ओर सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का संरक्षण।

सबरीमाला मंदिर, जो केरल के पथनमथिट्टा जिले में स्थित है, भगवान अयप्पा को समर्पित है और देश के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। यहां की परंपरा के अनुसार, भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं, इसलिए रजस्वला महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है।

वर्तमान सुनवाई इस बात पर केंद्रित है कि क्या धार्मिक प्रथाओं को बदलते सामाजिक मूल्यों के अनुसार ढाला जाना चाहिए या फिर उन्हें उनके मूल रूप में संरक्षित रखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला न केवल सबरीमाला मंदिर बल्कि देश भर के अन्य मंदिरों की परंपराओं के लिए भी मिसाल स्थापित करेगा।

इस विवाद ने एक बार फिर हमारे समाज के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच कोई मध्यमार्ग संभव है? या फिर इन दोनों मूल्यों में से किसी एक को प्राथमिकता देनी होगी? सुप्रीम कोर्ट का आगामी निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।

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