संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई, SIT गठन की संभावना
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन याचिकाओं पर सुनवाई करने वाला है, जिनमें 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाया गया है। केस CJI सूर्यकांत की बेंच में लिस्ट किया गया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

संसद मार्च हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख
संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों पर कथित बर्बरता के मामले में सुप्रीम कोर्ट आज फिर सुनवाई करने जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले में महत्वपूर्ण निर्देश जारी कर सकती है। याचिका में 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग और उसके बाद की स्थितियों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
न्यायालय के समक्ष मुख्य मुद्दा यह है कि क्या प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई की जांच के लिए किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, कोर्ट यह भी स्पष्ट करने का प्रयास करेगा कि पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों के पीछे वास्तविक प्रदर्शनकारी छात्र थे या भीड़ में शामिल शरारती तत्व, जिन्होंने स्थिति को हिंसक बनाया।
पिछली सुनवाई और राज्यों को निर्देश
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कठोर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि 18 वर्ष से कम आयु के प्रदर्शनकारियों का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। न्यायालय ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल सहित कई राज्यों को नोटिस जारी कर उनके महाधिवक्ताओं को ऑनलाइन पेश होने का निर्देश दिया था।
न्यायालय ने साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं। इसमें सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और पीसीआर लॉग जैसे डिजिटल सबूतों को संरक्षित करना शामिल है, ताकि भविष्य में जांच के दौरान इनका उपयोग किया जा सके।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और विवाद
यह पूरा विवाद NEET परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ था। 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेतृत्व में चला यह आंदोलन 36 दिनों तक जारी रहा। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान स्थिति तब बिगड़ गई जब सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। इस झड़प में 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। अंततः 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद यह आंदोलन समाप्त हुआ।
इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण याचिका राज्यसभा सांसद एए रहीम द्वारा दायर की गई है। इसमें प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपकरणों के उपयोग को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभाओं में इस तरह की निगरानी असंवैधानिक है।
कानूनी प्रक्रिया और कोर्ट का नजरिया
सुप्रीम कोर्ट में इस आंदोलन से जुड़ी याचिकाएं पहले भी कई बार आ चुकी हैं। पिछली सुनवाई के दौरान, जब वकीलों ने पुलिस बर्बरता के वीडियो दिखाने का अनुरोध किया था, तो पीठ ने स्पष्ट किया था कि न्यायालय का ध्यान कानूनी पहलुओं पर है, न कि वीडियो फुटेज देखने पर। कोर्ट ने समय की बर्बादी न करने की सलाह देते हुए मामले को सूचीबद्ध करने का आश्वासन दिया था।
आज की सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए टकराव के लिए जवाबदेही तय करने हेतु क्या कदम उठाती है। SIT के गठन पर निर्णय से इस पूरे मामले की दिशा तय हो सकती है। फिलहाल, सभी संबंधित राज्यों और पक्षों की नजरें सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर टिकी हैं।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!