बुजुर्गों को मिला बड़ा अधिकार: अब माता-पिता अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकेंगे उपेक्षा करने वाली संतान
अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति से बच्चों को निकाला जा सकता है। यह आदेश बुजुर्ग के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मान के लिए जरूरी होने पर दिया जा सकता है।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिक और माता-पिता अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार रखते हैं। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल द्वारा बेटे और बहू को घर से निकालने के फैसले को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बुजुर्गों की गरिमा, सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करना एक सभ्य समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की याचिका से उपजा है। गुप्ता ने जून 2022 में अपने बेटे को अपनी निजी संपत्ति से बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। स्थिति तब गंभीर हो गई जब गुप्ता की 81 वर्षीय मां को घर में उपेक्षा का सामना करना पड़ा और उन्हें वृद्धाश्रम जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। स्थानीय प्रशासन ने बुजुर्ग पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे और बहू को घर खाली करने का आदेश दिया था।
इस आदेश के खिलाफ बेटे और बहू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि वर्ष 2007 का कानून बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं देता है। इस आधार पर जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को खारिज कर दिया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को गलत मानते हुए हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।
कानूनी प्रावधान और कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून का मूल उद्देश्य बुजुर्गों को उपेक्षा और असुरक्षा से बचाना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' की धारा 8 ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान करती है। इसलिए, यदि बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा के लिए आवश्यक हो, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश देने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 41 का हवाला देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को जीवन भर सम्मान के साथ जीने का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि एक सभ्य समाज की पहचान इसी बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी सुरक्षा और सम्मान देता है। बढ़ती उम्र में अपमान और असुरक्षा को कानून कतई स्वीकार नहीं करता।
अतीत के फैसलों का आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस निर्णय को पुष्ट करने के लिए पूर्व के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। इसमें 'एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर' (2021) मामले का विशेष जिक्र किया गया, जिसमें तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। इसके अलावा, 'समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' और 'कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर' जैसे मामलों में भी इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया गया है।
इस फैसले से उन बुजुर्गों को बड़ी राहत मिली है जो अपनी ही संपत्ति में उपेक्षा या दुर्व्यवहार का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि कानून केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि बुजुर्गों को त्वरित राहत दिलाने का माध्यम बने। यह आदेश अब देश भर के ट्रिब्यूनल्स के लिए एक नजीर के रूप में काम करेगा, जिससे वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को और अधिक मजबूती मिलेगी।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!