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सिवनी: पेंच टाइगर रिजर्व में पांच वर्षों में 31 बाघों की मौत, एनटीसीए के आंकड़ों से चिंता

मध्यप्रदेश के सिवनी स्थित पेंच टाइगर रिजर्व और उससे सटे इलाकों में बीते पांच सालों (2021 से 2025) के दौरान 31 बाघों की जान चली गई है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के आंकड़ों से यह बात सामने आई है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

29 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
सिवनी: पेंच टाइगर रिजर्व में पांच वर्षों में 31 बाघों की मौत, एनटीसीए के आंकड़ों से चिंता
मूल स्रोत

मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में स्थित पेंच टाइगर रिजर्व और इसके आसपास के क्षेत्रों में बाघों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) द्वारा जारी किए गए हालिया आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2021 से 2025) के भीतर कुल 31 बाघों की मृत्यु दर्ज की गई है। यह आंकड़ा न केवल वन विभाग के लिए बल्कि वन्यजीव प्रेमियों के लिए भी चिंता का विषय है।

रिजर्व के भीतर और बाहर बाघों की मौत का ब्यौरा

एनटीसीए की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 31 बाघों में से 15 की मौत पेंच टाइगर रिजर्व की आधिकारिक सीमा के भीतर हुई है। वहीं, 16 बाघों ने रिजर्व से सटे बाहरी वन क्षेत्रों में दम तोड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रिजर्व के बाहर बाघों की बढ़ती मृत्यु दर इस बात का संकेत है कि बाघ अब अपने पारंपरिक आवास से निकलकर अन्य क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।

बाघों की मौत के कारणों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अधिकांश मौतें प्राकृतिक कारणों, आपसी संघर्ष, बीमारी और बढ़ती उम्र के चलते हुई हैं। हालांकि, मानवजनित हस्तक्षेप भी एक बड़ा कारण बना हुआ है। वर्ष 2024 में करंट लगने से एक बाघ की मौत का मामला सामने आया था, जबकि इससे पहले भी जहर देने और अवैध फंदा लगाने जैसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।

बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियां

बाघों के अपने कॉरिडोर से बाहर जाने के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष का जोखिम काफी बढ़ गया है। विधानसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, पिछले चार वर्षों में बाघों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा लगभग 19.15 करोड़ रुपए की राशि खर्च की गई है। इसके बावजूद बाघों की जान बचाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाघों के संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। दक्षिण सामान्य वनमंडल के डीएफओ गौरव मिश्र ने जोर देते हुए कहा कि बाघों को बचाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत वन विभाग को दें ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके।

जागरूकता और भविष्य की रणनीति

बाघों और ग्रामीणों के बीच के तनाव को कम करने के लिए वन विभाग द्वारा 'बाघ चौपाल' का आयोजन किया जा रहा है। इन चौपालों के माध्यम से स्थानीय निवासियों को वन्यजीवों के व्यवहार और सुरक्षा के उपायों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। साथ ही, टाइगर स्ट्राइक फोर्स की निगरानी को और अधिक सख्त कर दिया गया है ताकि अवैध शिकार जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके।

उत्तर सामान्य वनमंडल के डीएफओ महेन्द्र सिंह उइके के अनुसार, बाघों का अस्तित्व पर्यावरण, जैव विविधता और जल स्रोतों के संतुलन के लिए अनिवार्य है। पेंच टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर पुनीत गोयल ने स्पष्ट किया कि बाघ सामान्यतः इंसानों पर हमला नहीं करते हैं, वे केवल तभी आक्रामक होते हैं जब उन्हें अपनी जान का खतरा महसूस होता है।

आने वाले समय में वन विभाग की प्राथमिकता बाघों के कॉरिडोर को सुरक्षित बनाने और उनके प्राकृतिक आवास को और अधिक सुदृढ़ करने की होगी। एनटीसीए के इन आंकड़ों ने प्रशासन को अपनी कार्ययोजना की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है ताकि भविष्य में बाघों की मौतों के आंकड़ों को कम किया जा सके।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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