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राजस्थान निकाय चुनाव: जीत के बाद पार्षदों की 'बाड़ेबंदी' का सियासी खेल, रिसॉर्ट्स में कैद हुई सत्ता की चाबी

राजस्थान के 309 निकायों में पार्षदों की जीत-हार तय होने के बाद असली सियासी ‘खेला’ शुरू हो चुका है। जनता ने वोट डाल दिए, ईवीएम से पार्षदों के रिजल्ट भी निकल आए।

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

18 सितंबर 20263 मिनट पढ़ें
राजस्थान निकाय चुनाव: जीत के बाद पार्षदों की 'बाड़ेबंदी' का सियासी खेल, रिसॉर्ट्स में कैद हुई सत्ता की चाबी
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राजस्थान के 309 निकायों में पार्षदों के चुनाव परिणाम घोषित होने के साथ ही प्रदेश में 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' का दौर शुरू हो गया है। जनता द्वारा चुने गए पार्षदों को जीत के जश्न के बजाय सीधे लग्जरी बसों में भरकर अज्ञात स्थानों और फाइव-स्टार रिसॉर्ट्स में ले जाया गया है। इस बाड़ेबंदी का मुख्य उद्देश्य निकाय प्रमुख यानी मेयर और चेयरमैन के चुनाव तक अपने पार्षदों की संख्या बल को सुरक्षित रखना है।

सत्ता के समीकरण और बाड़ेबंदी की मजबूरी

निकाय चुनाव में पार्षदों का चयन तो जनता ने कर दिया, लेकिन असली सत्ता का फैसला अभी बाकी है। जिन निकायों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां निर्दलीय और बागी पार्षदों की भूमिका निर्णायक हो गई है। राजनीतिक दल इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कहीं मतदान के समय उनके पार्षद पाला न बदल लें या क्रॉस वोटिंग न कर दें। इसी डर के कारण पार्षदों को एक सुरक्षित घेरे में रखा जा रहा है।

आंकड़ों पर गौर करें तो 10,244 वार्डों में भाजपा ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 सीटों पर जीत दर्ज की है। जहां मुकाबला कड़ा है, वहां एक-दो पार्षदों का समर्थन भी बोर्ड के गठन की दिशा बदल सकता है। अजमेर जैसे निकायों में, जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों का अंतर बहुत कम है, वहां पार्षदों को बेंगलुरु जैसे दूरस्थ शहरों में भेजने की रणनीति अपनाई गई है।

लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठते सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि बाड़ेबंदी की यह संस्कृति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, राजनीतिक दलों में निष्ठा के बजाय अवसरवाद हावी हो रहा है। पार्षदों को रिसॉर्ट्स में कैद करने की प्रक्रिया जनता के उस विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है, जिसके आधार पर उन्होंने अपना प्रतिनिधि चुना था। यह अविश्वास की राजनीति दलों के भीतर के आंतरिक संकट को भी दर्शाती है।

दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा नियमों के तहत मेयर या चेयरमैन बनने के लिए पार्षद होना अनिवार्य नहीं है। इस कारण कई जगह ऐसे उम्मीदवार भी दौड़ में शामिल हैं जो खुद चुनाव हार चुके हैं। इससे निकाय चुनाव का गणित दो स्तरों पर काम कर रहा है—एक तरफ जनता द्वारा चुने गए पार्षद हैं और दूसरी तरफ सत्ता की कुर्सी के लिए चल रही पर्दे के पीछे की जोड़-तोड़।

आगे की राह और चुनाव की तारीखें

पार्षदों की यह बाड़ेबंदी 21 सितंबर को होने वाली वोटिंग तक जारी रहने की संभावना है। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों में मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव क्रमशः 25 और 26 सितंबर को निर्धारित किए गए हैं। तब तक सभी प्रमुख दल अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इस दौरान जीत का जश्न भी फीका पड़ गया है, क्योंकि जुलूस निकालने पर रोक और बाड़ेबंदी की सख्ती ने पार्षदों की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है।

अंततः, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह बाड़ेबंदी पार्टियों को बहुमत दिलाने में सफल रहती है या फिर मतदान के दिन कोई बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है। फिलहाल, राजस्थान की राजनीति पूरी तरह से इन रिसॉर्ट्स और होटलों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है, जहां से निकाय की अगली सरकार की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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