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मुंबई की कामकाजी महिलाओं ने स्मार्टफोन से रची अपनी दुनिया, 'मस्त महिला मंडली' डॉक्यूमेंट्री की जयपुर में स्क्रीनिंग

किसी के हाथ में कैमरा हो और सामने उसकी अपनी जिंदगी... तो कहानी सिर्फ रिकॉर्ड नहीं होती, बल्कि एक आवाज बन जाती है। रविवार को जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में कुछ ऐसी ही आवाजें सुनाई दीं।

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

23 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
मुंबई की कामकाजी महिलाओं ने स्मार्टफोन से रची अपनी दुनिया, 'मस्त महिला मंडली' डॉक्यूमेंट्री की जयपुर में स्क्रीनिंग
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जब स्मार्टफोन बना अभिव्यक्ति का जरिया

जयपुर के जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में हाल ही में एक अनूठी डॉक्यूमेंट्री 'मस्त महिला मंडली' की स्क्रीनिंग की गई। यह फिल्म महज 72 मिनट की एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि मुंबई के चेंबूर इलाके की 10 कामकाजी महिलाओं के संघर्ष, सपनों और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का एक जीवंत दस्तावेज है। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बनाने वाली महिलाएं ही इसके मुख्य किरदार हैं। उन्होंने न केवल अपने जीवन के पन्नों को कैमरे में कैद किया, बल्कि खुद ही कैमरा संभालकर अपनी कहानी दुनिया के सामने रखी।

इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने वाली टीम में अंजुम शेख, दर्शना मायकर, गौरी राणे, कविता खोमने, नाजनीन सिद्दीकी, रोहिणी कदम, रेहाना शेख, शीतल नवले, कविता घुग्गे और वैशाली माने शामिल हैं। इन महिलाओं ने टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) के मीडिया एवं कल्चरल स्टडीज विभाग के मार्गदर्शन में दो साल तक फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता और प्रोफेसर शिल्पी गुलाटी के निर्देशन में उन्होंने स्मार्टफोन के जरिए शूटिंग, ऑडियो रिकॉर्डिंग और एडिटिंग जैसे तकनीकी कौशल में महारत हासिल की।

बस्ती के संघर्ष से परे खुशियों की तलाश

अक्सर बस्तियों में रहने वाली महिलाओं के जीवन को केवल गरीबी और अभाव के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन 'मस्त महिला मंडली' इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। फिल्म में महिलाओं की दोस्ती, हंसी-मजाक, शरारतें और उनके आत्मविश्वास को प्रमुखता से दिखाया गया है। नाजनीन सिद्दीकी का मानना है कि बस्ती की महिलाओं की जिंदगी केवल दुख की कहानी नहीं है, बल्कि वे भी अपनी शर्तों पर जीना और सपने देखना बखूबी जानती हैं।

फिल्म के कुछ दृश्य दर्शकों के दिलों को छू लेने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर, रेहाना शेख का रसोई में काम करते हुए नृत्य करना यह दर्शाता है कि कैसे महिलाएं घर की जिम्मेदारियों के बीच भी अपनी खुशी के लिए जगह बना लेती हैं। वहीं, कविता का संविधान पढ़ना महिलाओं में बढ़ती जागरूकता और समानता के प्रति उनकी समझ को प्रदर्शित करता है। फिल्म में महिलाओं को कबड्डी खेलते और बाइक चलाते हुए भी दिखाया गया है, जो उनकी बढ़ती स्वतंत्रता का प्रतीक है।

एक सामाजिक अभियान से सिनेमाई सफर तक

इस डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत करीब 15 साल पहले कोरो इंडिया द्वारा शुरू किए गए 'राइट टू पी' (पेशाब का अधिकार) अभियान से हुई थी। उस समय उद्देश्य महिलाओं के लिए स्वच्छता और सार्वजनिक शौचालयों की मांग करना था। धीरे-धीरे इस पहल ने एक रचनात्मक मोड़ लिया और महिलाओं को स्मार्टफोन देकर अपनी दुनिया को रिकॉर्ड करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसी प्रक्रिया ने उन्हें यह अहसास कराया कि उनकी अपनी जिंदगी भी एक महत्वपूर्ण कहानी है जिसे दर्ज किया जाना चाहिए।

शुरुआत में कैमरे के सामने आने और अपनी निजी बातें साझा करने में इन महिलाओं को काफी झिझक हुई थी। लेकिन निरंतर प्रशिक्षण और समूह के आपसी सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी। स्क्रीनिंग के दौरान दर्शकों के साथ संवाद करते हुए यह स्पष्ट हुआ कि कहानी कहने का अधिकार केवल पेशेवर फिल्मकारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि तकनीक और प्रशिक्षण सही हाथों में हो, तो आम लोग भी अपनी प्रामाणिक कहानियां दुनिया तक पहुंचा सकते हैं।

बदलता नजरिया और भविष्य की राह

जयपुर में हुई इस स्क्रीनिंग ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि किसी महिला की पहचान केवल उसके परिवार या घर तक ही सीमित क्यों होनी चाहिए? फिल्म यह सवाल उठाती है कि महिलाओं के अपने शौक, विचार और सपने भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 'मस्त महिला मंडली' न केवल एक फिल्म है, बल्कि यह उन महिलाओं की आवाज है जिन्होंने कैमरे के पीछे खड़े होकर अपनी पहचान को खुद गढ़ा है।

इस डॉक्यूमेंट्री की सफलता यह साबित करती है कि सामुदायिक स्तर पर किए गए प्रयास किस तरह बड़े सामाजिक बदलाव का आधार बन सकते हैं। फिल्म निर्माण की इस यात्रा ने न केवल महिलाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाया, बल्कि उन्हें अपनी बात कहने का एक सशक्त मंच भी प्रदान किया। आने वाले समय में ऐसी पहल अन्य समुदायों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं, जहां महिलाएं अपनी समस्याओं को खुद कैमरे के जरिए दुनिया के सामने रख सकेंगी।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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