मध्य प्रदेश में डकैती कानून का दुरुपयोग: कांग्रेस नेता का आरोप, 5 साल में 1000 फर्जी मुकदमे दर्ज
मध्यप्रदेश में केवट, मांझी, मल्लाह, ढीमर और भोई समाज की एक विशाल आबादी निवास करती है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस विशाल आबादी को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने और सामाजिक प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से महेश केवट को राज्यसभा भेजा है।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

डकैती कानून के दुरुपयोग का गंभीर आरोप
मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने राज्य सरकार पर 'मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981' का दुरुपयोग करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के तहत कांग्रेस कार्यकर्ताओं को फंसाने और उन्हें जेल भेजने के लिए किया जा रहा है। डॉ. सिंह के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्य के विभिन्न जिलों में इस कानून के तहत 1,000 से अधिक निर्दोष लोगों पर झूठे मामले दर्ज किए गए हैं।
डॉ. सिंह ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि 1981 में यह कानून चंबल और रीवा संभाग में डकैतों के आतंक को खत्म करने के लिए बनाया गया था। उस समय क्षेत्र में 20 से अधिक गिरोह सक्रिय थे। हालांकि, 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं घोषणा की थी कि राज्य से डकैती की समस्या पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद, यह कठोर कानून आज भी प्रभावी है, जिसके तहत आरोपियों को जमानत मिलना अत्यंत कठिन होता है।
मामूली विवादों में भी दस्यु अधिनियम का प्रयोग
कांग्रेस नेता ने कई चौंकाने वाले उदाहरण पेश किए। उन्होंने बताया कि दतिया में महज 800 रुपये के मोबाइल फोन के विवाद में पुलिस ने डकैती की धाराएं लगा दीं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने हिरासत में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया। डॉ. सिंह ने कहा कि कानून में प्रावधान है कि पुलिस अधीक्षक (एसपी) की एनओसी मिलने पर जमानत मिल सकती है, लेकिन जब पुलिस स्वयं फर्जी मामले दर्ज कर रही हो, तो राहत की उम्मीद करना बेमानी है।
लहार के रौन थाने का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि अवैध रेत खनन का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं पर बदले की भावना से दस्यु उन्मूलन के तहत केस दर्ज किए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारी अपनी वसूली का विरोध करने वालों को 'डकैत' का ठप्पा लगाकर जेल भेज रहे हैं, जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
रेत माफिया और पुलिस की मिलीभगत
डॉ. गोविंद सिंह ने रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंध नदी में पनडुब्बियों के जरिए अवैध खनन किया जा रहा है और इस कारोबार का 80 प्रतिशत हिस्सा पुलिस और स्थानीय प्रशासन की जेब में जाता है। उन्होंने दावा किया कि एक स्थानीय भाजपा विधायक के पिता के नाम पर पांच ट्रैक्टर अवैध रेत परिवहन में लगे हैं, जिन्हें रोकने की हिम्मत पुलिस में नहीं है।
कांग्रेस नेता ने बताया कि अवैध खनन से जुड़ी इस पूरी व्यवस्था में थाना प्रभारियों से लेकर खनिज और राजस्व विभाग तक की मिलीभगत है। उन्होंने इस मामले में एनजीटी (NGT) में याचिका भी दायर की है, जिसके बाद एक जांच समिति का गठन किया गया है। उन्होंने मांग की है कि सरकार इस कानून की समीक्षा करे और निर्दोषों पर दर्ज किए गए फर्जी मुकदमों को तुरंत वापस ले।
कानून की प्रासंगिकता पर सवाल
विपक्ष का कहना है कि जब राज्य में डकैतों का कोई अस्तित्व ही नहीं है, तो फिर इस विशेष कानून को जारी रखने का औचित्य क्या है? डॉ. सिंह ने कहा कि यह कानून अब केवल राजनीतिक विरोधियों को दबाने का एक हथियार बनकर रह गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस दमनकारी नीति को नहीं बदला, तो कांग्रेस इसे लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन करेगी।
इस पूरे मामले ने मध्य प्रदेश की कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर सरकार अपनी उपलब्धियां गिना रही है, वहीं विपक्ष के इन आरोपों ने शासन की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या भविष्य में इस कानून के प्रावधानों में कोई बदलाव किया जाता है।

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मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!