मुरैना का 'काजी बसई': जहां हर घर से निकलती है फौज की राह, 11 जवानों ने दी देश के लिए शहादत
यहां आजादी का जश्न सिर्फ तिरंगा फहराकर नहीं मनाया जाता, यहां पीढ़ियां तिरंगे की हिफाजत करके आजादी को जिंदा रखती हैं। यह लाइन मुरैना जिले के काजी बसई गांव पर फिट बैठती है।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

सीमाओं के रक्षक: पीढ़ियों से जारी है शहादत और सेवा का सिलसिला
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित काजी बसई गांव देश के उन चुनिंदा गांवों में से एक है, जहां देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं है। यहां की गलियों में हर घर का नाता सेना, सीआरपीएफ या बीएसएफ जैसे सुरक्षा बलों से जुड़ा है। आजादी के आठ दशक बाद भी इस गांव के युवाओं में वर्दी पहनने का जज्बा कम नहीं हुआ है। गांव की मिट्टी में पली-बढ़ी पीढ़ियां देश की सीमाओं पर तैनात होकर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प निभा रही हैं।
काजी बसई का सैन्य इतिहास प्रथम विश्व युद्ध के दौर से शुरू होता है। गांव के अब्दुल वासिद ने सिंधिया स्टेट की सेना से जुड़कर जर्मनी में शहादत दी थी। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध, 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग, कारगिल युद्ध और हालिया ऑपरेशन सिंदूर तक, गांव के जवानों ने हर मोर्चे पर अपनी वीरता का परिचय दिया है। अब तक इस गांव के 11 वीर सपूत देश के लिए शहीद हो चुके हैं, जिनमें 9 मुस्लिम और 2 हिंदू जवान शामिल हैं।
परंपरा बनी वर्दी: दादा से पोते तक का सफर
गांव के पूर्व सैनिकों के अनुसार, यहां फौज में जाना नौकरी नहीं बल्कि एक पारिवारिक जिम्मेदारी है। रिटायर्ड सीआरपीएफ जवान मोहम्मद जफर बताते हैं कि उनके परिवार की चार पीढ़ियां सुरक्षा बलों में रही हैं। पंजाब में आतंकवाद के दौर में तैनाती के दौरान उन्होंने अपने कई साथियों को खोया, लेकिन परिवार का हौसला कभी नहीं टूटा। आज उनके परिवार की अगली पीढ़ी भी सेना का हिस्सा बनकर देश की सेवा कर रही है।
इसी तरह रिटायर्ड एसआई मोहम्मद शफीक का परिवार भी दशकों से वर्दी की सेवा में है। श्रीलंका में शांति अभियान से लेकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनाती तक, उन्होंने देश की हर चुनौती का सामना किया है। दिलचस्प बात यह है कि जिस छत्तीसगढ़ में उन्होंने कभी नक्सल विरोधी अभियान में भाग लिया था, आज उनका बेटा उसी क्षेत्र में तैनात होकर देश की सुरक्षा कर रहा है।
कठिन परिस्थितियों ने तैयार किए फौलादी इरादे
गांव की इस सैन्य परंपरा के पीछे एक बड़ा कारण यहां की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी रही हैं। पूर्व प्राचार्य मोहम्मद हबीब बताते हैं कि पुराने समय में स्कूल पांच किलोमीटर दूर होते थे, जिसके कारण बच्चों को रोज पैदल या दौड़कर जाना पड़ता था। इस दिनचर्या ने युवाओं को शारीरिक रूप से इतना सक्षम बना दिया कि सेना की भर्ती प्रक्रिया उनके लिए सहज हो गई। आज भी गांव के 90 प्रतिशत युवा सेना में जाने की तैयारी करते हैं।
बीएसएफ से रिटायर्ड अब्दुल महफूज अब्बासी का मानना है कि सेना में धर्म से ऊपर केवल तिरंगा होता है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में शामिल रहे अब्बासी कहते हैं कि वहां सिर्फ देशसेवा ही एकमात्र धर्म है। गांव के लोग शहादत के गम को भी एक गौरव के रूप में देखते हैं। जब एक परिवार का बेटा शहीद होता है, तो दूसरा बच्चा सेना की तैयारी शुरू कर देता है। यह जज्बा ही काजी बसई को देश के अन्य गांवों से अलग बनाता है।
सीमाओं पर पहरा, गांव की सामूहिक पहचान
काजी बसई के लिए 15 अगस्त का दिन केवल तिरंगा फहराने का नहीं, बल्कि उन पूर्वजों और शहीदों को याद करने का है जिन्होंने देश की आजादी और अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। युद्धों की यादें आज भी बुजुर्गों की आंखों में ताजा हैं, लेकिन उनके चेहरे पर गर्व की चमक यह दर्शाती है कि देश की रक्षा के लिए वे हमेशा तैयार हैं।
आज भी जब गांव में कोई नया जवान भर्ती होकर आता है, तो पूरे गांव में उत्सव का माहौल होता है। यह गांव न केवल मुरैना बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यहां की हर दीवार पर शहीद की तस्वीर और हर घर में वर्दी की मौजूदगी यह साबित करती है कि काजी बसई के लोग अपने देश की हिफाजत के लिए सदैव तत्पर हैं।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!