मध्य प्रदेश में दूध उत्पादन का कागजी चमत्कार: पशु घटे, फिर भी लाखों टन दूध बढ़ा; क्या बाजार में बिक रहा 'सफेद जहर'?
मध्यप्रदेश के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले पांच सालों में प्रदेश में एक भी दुधारू गाय या भैंस नहीं बढ़ी, लेकिन कागजों पर राज्य का दूध उत्पादन 179.99 लाख मीट्रिक टन से छलांग लगाकर 213.26 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गया। यानी 33.27 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त दूध कहां से आया?

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में भारी अंतर
मध्य प्रदेश के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के हालिया आंकड़े एक बड़े विरोधाभास की ओर इशारा कर रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्य में दुधारू पशुओं की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई है। इसके बावजूद, दूध उत्पादन के आंकड़ों में 179.99 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 213.26 लाख मीट्रिक टन तक की भारी उछाल दर्ज की गई है। यह 33.27 लाख मीट्रिक टन का अतिरिक्त दूध कहां से आया, यह सवाल अब खाद्य सुरक्षा और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
इस कागजी वृद्धि के आधार पर मध्य प्रदेश को देश में तीसरा सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य बताया जा रहा है। हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल उलट है। महंगाई की मार और चारे की बढ़ती कीमतों के कारण बड़ी संख्या में डेयरी संचालक अपना व्यवसाय बंद करने को मजबूर हुए हैं। विदिशा जैसे क्षेत्रों में डेयरी संचालकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में उनके पास मौजूद पशुओं की संख्या में 70% तक की कमी आई है, जिससे उत्पादन बढ़ने के बजाय कम होना चाहिए था।
क्या मिलावटी दूध से भरा जा रहा है मांग का अंतर?
विशेषज्ञों और स्थानीय कारोबारियों के अनुसार, बाजार में दूध की मांग और आपूर्ति के बीच के इस बड़े अंतर को सिंथेटिक दूध के जरिए पूरा किए जाने की आशंका है। नाम न छापने की शर्त पर एक कारोबारी ने खुलासा किया कि शैंपू, डिटर्जेंट पाउडर, रिफाइंड तेल, यूरिया और ग्लूकोज पाउडर का उपयोग करके नकली दूध तैयार किया जा रहा है। इस 'सफेद जहर' को असली दूध के साथ मिलाकर बाजार में खपाया जाता है, जिससे जांच के दौरान इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
पशुपालन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि नस्ल सुधार कार्यक्रमों के कारण प्रति पशु दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई है। विभाग के अनुसार, साहीवाल, गिर और मुर्रा जैसी उन्नत नस्लों के कारण प्रति पशु दूध देने की क्षमता बढ़ी है। हालांकि, विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें सिंथेटिक दूध के संबंध में अब तक कोई आधिकारिक शिकायत नहीं मिली है, जबकि स्वतंत्र जांच में मिलावट के प्रमाण सामने आ रहे हैं।
स्वतंत्र जांच में मिलावट की पुष्टि
हाल ही में ग्वालियर-चंबल अंचल में की गई सैंपलिंग के दौरान चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग और निजी लैब द्वारा की गई जांच में दूध के कई नमूनों में रिफाइंड तेल और अन्य हानिकारक रसायनों की पुष्टि हुई है। भिंड और आसपास के क्षेत्रों में की गई रैपिड किट जांच में भी बड़ी संख्या में दूध के नमूने संदिग्ध पाए गए हैं। इन नमूनों को अब विस्तृत जांच के लिए भोपाल स्थित प्रयोगशाला भेजा गया है।
यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि उन ईमानदार पशुपालकों के लिए भी संकट है जो महंगाई के बीच असली दूध का उत्पादन कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों का 'कॉपी-पेस्ट' होना और जमीनी स्तर पर पशुओं की घटती संख्या यह दर्शाती है कि नीति निर्धारण में कहीं न कहीं बड़ी चूक हो रही है। यदि समय रहते इस मिलावटी नेटवर्क पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह न केवल स्वास्थ्य संकट को जन्म देगा, बल्कि डेयरी उद्योग की विश्वसनीयता को भी पूरी तरह खत्म कर देगा।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!