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कानपुर: तेज रफ्तार बन रही युवाओं की दिव्यांगता का कारण, 70% हादसों में गंभीर ट्रॉमा

सड़कों पर दौड़ती तेज रफ्तार गाड़ियां युवाओं की जिंदगी में ऐसा स्पीड ब्रेकर लगा रही हैं, जिससे संभलना मुश्किल हो रहा है। कानपुर में हुए एक ताजा और चौंकाने वाले अध्ययन में सामने आया है कि सड़क हादसों का शिकार होने वाले हर दूसरे युवा में हाई वेलोसिटी ट्रॉमा की पुष्टि हो रही है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

20 जुलाई 20262 मिनट पढ़ें
कानपुर: तेज रफ्तार बन रही युवाओं की दिव्यांगता का कारण, 70% हादसों में गंभीर ट्रॉमा
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कानपुर की सड़कों पर बेकाबू रफ्तार युवाओं के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के अस्थि रोग विभाग द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन ने सड़क हादसों की भयावह तस्वीर पेश की है। शोध के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वाले युवाओं में 'हाई वेलोसिटी ट्रॉमा' के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो उन्हें स्थायी रूप से दिव्यांग बनाने की मुख्य वजह बन रहे हैं।

हाई वेलोसिटी ट्रॉमा का बढ़ता प्रकोप

अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती होने वाले करीब 200 घायलों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि तेज रफ्तार गाड़ियों या बाइक की टक्कर से होने वाले हादसों में सिर्फ हड्डियां ही नहीं टूटतीं, बल्कि आसपास के ऊतक (टिश्यूज) और नसें भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इसे ही 'हाई वेलोसिटी ट्रॉमा' कहा जाता है।

डॉक्टरों का कहना है कि जब कोई वाहन उच्च गति में होता है, तो टक्कर के दौरान शरीर पर पड़ने वाला भारी दबाव हड्डियों को कई टुकड़ों में बिखेर देता है। इस प्रक्रिया में मांसपेशियों को होने वाला गंभीर नुकसान घाव भरने की प्रक्रिया को अत्यंत जटिल बना देता है। यही कारण है कि उपचार के बाद भी कई युवाओं के अंग पूरी तरह से कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं या उनमें विकृति आ जाती है।

आंकड़ों में रफ्तार का घातक गणित

अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि अस्पताल पहुंचने वाले कुल सड़क दुर्घटना पीड़ितों में से 65 से 70 प्रतिशत मरीज हाई वेलोसिटी ट्रॉमा के शिकार होते हैं। इसके विपरीत, लगभग 30 से 35 प्रतिशत मामले ऐसे हैं जो कम गति पर गिरने या फिसलने के कारण होते हैं, जिन्हें 'लो वेलोसिटी ट्रॉमा' की श्रेणी में रखा गया है। यह स्पष्ट करता है कि अधिकांश गंभीर चोटें लापरवाही और अत्यधिक गति के कारण हो रही हैं।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हाई वेलोसिटी ट्रॉमा के मरीजों में रिकवरी की दर बहुत कम है। सामान्य चोटों की तुलना में, इन गंभीर मामलों में पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना मात्र 30 प्रतिशत ही रह जाती है। इसका अर्थ यह है कि तेज रफ्तार के शिकार होने वाले अधिकांश युवा जीवनभर के लिए किसी न किसी शारीरिक अक्षमता या कमजोरी के साथ जीने को मजबूर हो रहे हैं।

इलाज के बाद भी चुनौतियों का सामना

अस्थि रोग विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, हाई वेलोसिटी ट्रॉमा के मरीजों का इलाज काफी लंबा और चुनौतीपूर्ण होता है। मांसपेशियों के अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने के कारण सर्जरी के बाद भी अंगों की कार्यक्षमता पूरी तरह बहाल नहीं हो पाती। यह स्थिति न केवल युवाओं के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि उनके करियर और भविष्य की संभावनाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।

मेडिकल कॉलेज प्रशासन इस डेटा का विश्लेषण कर रहा है ताकि दुर्घटनाओं की गंभीरता और उनके दीर्घकालिक प्रभावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। यह अध्ययन समाज के लिए एक चेतावनी है कि सड़कों पर अनुशासन और गति सीमा का पालन न करना युवा पीढ़ी के लिए कितना घातक साबित हो सकता है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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