जोधपुर: रेगिस्तानी जमीन पर आधुनिक खेती का कमाल, किसान ने ज्वार की फसल से बदली तकदीर
जोधपुर जिले के पीपाड़ जालीवाड़ा खुर्द के सुमेरसिंह कछवाहा ने कृषि विज्ञान से पढ़ाई की है। आधुनिक कृषि तकनीक मल्चिंग अपनाकर अपनी किस्मत बदल दी।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

पारंपरिक खेती को छोड़ अपनाया नवाचार
जोधपुर जिले के पीपाड़ स्थित जालीवाड़ा खुर्द के रहने वाले सुमेरसिंह कछवाहा ने अपनी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खेती की परिभाषा बदल दी है। कृषि विज्ञान में शिक्षित सुमेरसिंह के परिवार की पारंपरिक खेती से सालाना आय मात्र 3 से 3.5 लाख रुपये तक सीमित थी, जिससे घर का खर्च चलाना भी चुनौतीपूर्ण होता था। सरकारी नौकरी की तैयारी के साथ-साथ उन्होंने खेती में नए प्रयोग करने का निर्णय लिया।
काजरी के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन और आत्मा परियोजना के तहत विभिन्न कृषि संस्थानों के भ्रमण ने सुमेरसिंह की सोच को नई दिशा दी। उन्होंने मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया, जिससे उनकी 13 बीघा उपजाऊ जमीन की उत्पादकता कई गुना बढ़ गई। आज उनकी सालाना आय 14 से 15 लाख रुपये तक पहुंच गई है, जो उनके नवाचारों का प्रमाण है।
नर्सरी और सब्जियों से बढ़ाई आमदनी
सुमेरसिंह ने साढ़े तीन बीघा जमीन पर एक अत्याधुनिक नर्सरी स्थापित की है। यहाँ वे फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, बैंगन और टमाटर की लगभग 2 लाख हाइब्रिड पौध तैयार करते हैं। इस नर्सरी से उन्हें सालाना 5 लाख रुपये की अतिरिक्त आय होती है और स्थानीय किसानों को भी उच्च गुणवत्ता वाले पौधे आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
इसके अलावा, उन्होंने 7 बीघा जमीन पर बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति का उपयोग करते हुए सब्जियों की खेती शुरू की है। गोभी, टमाटर, हरी प्याज और लौकी जैसी फसलों से उन्हें सालाना 8 लाख रुपये की शुद्ध कमाई हो रही है। शेष जमीन पर वे पारंपरिक फसलें जैसे मूंग, मोठ और ईसबगोल उगाकर भी अपनी आय को सुरक्षित रखते हैं।
रेगिस्तान में लहलहाई 12 फीट ऊंची ज्वार
सुमेरसिंह ने हाल ही में आईसीआर दिल्ली द्वारा विकसित ज्वार की एक उन्नत किस्म की बुआई की है। हरियाणा और गुजरात के कृषि भ्रमण से प्रेरित होकर उन्होंने जोधपुर की रेतीली जमीन पर इसे उगाया। आश्चर्यजनक रूप से, महज एक महीने के भीतर ही इन पौधों की ऊंचाई 10 से 12 फीट तक पहुंच गई है, जो क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है।
खेती के साथ-साथ पशुपालन में भी उन्होंने वैज्ञानिक तरीका अपनाया है। उनके पास उन्नत नस्ल की चार गायें हैं। दूध की बिक्री के अलावा, वे घी बनाकर सालाना 1 से 1.5 लाख रुपये अतिरिक्त कमा रहे हैं। पशुओं के अपशिष्ट से तैयार जैविक खाद का उपयोग खेतों में करने से रसायनों पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो गया है।
भविष्य की राह और अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
सुमेरसिंह की यह सफलता साबित करती है कि यदि सही तकनीक और वैज्ञानिक मार्गदर्शन का उपयोग किया जाए, तो रेगिस्तानी जमीन भी सोना उगल सकती है। उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि इलाके के अन्य किसानों को भी कम पानी में अधिक उत्पादन लेने के लिए प्रेरित किया है। उनकी यह यात्रा कृषि क्षेत्र में नवाचार के महत्व को रेखांकित करती है।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!