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जयपुर नगर निगम चुनाव: वार्ड आरक्षण ने बदला सियासी समीकरण, 17 दिग्गज नेताओं की बढ़ी मुश्किलें

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

18 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
जयपुर नगर निगम चुनाव: वार्ड आरक्षण ने बदला सियासी समीकरण, 17 दिग्गज नेताओं की बढ़ी मुश्किलें
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आरक्षण प्रक्रिया से बदला चुनावी गणित

जयपुर नगर निगम के आगामी चुनावों के लिए कलेक्ट्रेट में संपन्न हुई आरक्षण प्रक्रिया ने शहर की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। करीब साढ़े चार घंटे तक चली इस प्रक्रिया में 150 वार्डों का आरक्षण तय किया गया, जिसके बाद भाजपा और कांग्रेस के कम से कम 17 बड़े दावेदारों का पूरा चुनावी गणित बिगड़ गया है। कई वरिष्ठ नेता, जो अपने पुराने वार्डों से जीत की पक्की उम्मीद लगाए बैठे थे, अब आरक्षण की मार के चलते नए वार्डों की तलाश करने को मजबूर हैं।

मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, 150 वार्डों में से 56 वार्ड आरक्षित किए गए हैं, जिनमें 20 एससी, 6 एसटी और 30 ओबीसी वर्ग के लिए हैं। इसके अलावा 50 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हुए हैं, जबकि 94 वार्ड सामान्य श्रेणी में रखे गए हैं। इस बदलाव ने न केवल पार्षद पद के दावेदारों को प्रभावित किया है, बल्कि उन नेताओं की भी चिंता बढ़ा दी है जो मेयर पद की दौड़ में शामिल होने का सपना देख रहे हैं।

दिग्गज नेताओं के सामने नई चुनौतियां

किशनपोल क्षेत्र में भाजपा नेता राजू मंगोड़ीवाला की दावेदारी को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उनका वार्ड सामान्य महिला श्रेणी में चला गया है। वहीं, मालवीय नगर में पूर्व चेयरमैन जितेंद्र श्रीमाली का वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित होने से उन्हें अब सुरक्षित सीट की तलाश है। इसी तरह, आदर्श नगर में पार्षद उमरदराज के पुराने वार्ड का परिसीमन के बाद तीन हिस्सों में बंटवारा हो गया और तीनों ही महिला श्रेणी में चले गए हैं, जिससे उन्हें अब वार्ड 128 पर अपना ध्यान केंद्रित करना पड़ रहा है।

विद्याधर नगर और सांगानेर जैसे क्षेत्रों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। विद्याधर नगर के वार्ड 20 के सामान्य महिला होने से पूर्व चेयरमैन अजय सिंह की दावेदारी प्रभावित हुई है। सांगानेर में पूर्व चेयरमैन भारती लख्यानी का वार्ड ओबीसी पुरुष होने के बाद अब उनके पति मुकेश लख्यानी की दावेदारी पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। झोटवाड़ा में राखी राठौड़ की स्थिति फिलहाल स्थिर बनी हुई है क्योंकि उनका वार्ड सामान्य श्रेणी में है।

टिकट वितरण और आंतरिक गुटबाजी

आरक्षण के बाद अब असली लड़ाई टिकट पाने की शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टियां टिकट देते समय केवल पार्षद की लोकप्रियता नहीं, बल्कि मेयर पद की उनकी क्षमता और संगठन के साथ उनके तालमेल को भी प्राथमिकता देंगी। विधानसभा क्षेत्रों में पहले से सक्रिय गुटबाजी निगम चुनाव में भी अपना असर दिखा सकती है। हवामहल, किशनपोल और मालवीय नगर जैसे क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं और समर्थकों के बीच टिकट को लेकर खींचतान के आसार हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के भीतर स्थानीय स्तर पर समीकरणों को साधने की कवायद तेज हो गई है। भाजपा में जहां संगठन के बड़े नेताओं के बीच तालमेल बिठाना चुनौती है, वहीं कांग्रेस में भी विभिन्न खेमों के दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। सांगानेर और आदर्श नगर जैसे इलाकों में स्थानीय राजनीतिक धड़ों की सक्रियता टिकट वितरण की प्रक्रिया को सीधे तौर पर प्रभावित करेगी।

आगे की राह और भविष्य की रणनीति

वार्डों के परिसीमन और आरक्षण के बाद अब दावेदारों की संख्या और भी बढ़ गई है। 250 से घटकर 150 वार्ड होने के कारण पहले से मौजूद 100 पूर्व पार्षदों के लिए भी अपनी जमीन बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई नेता जो मेयर बनना चाहते हैं, वे अब पार्षद का चुनाव लड़ने में भी संकोच कर रहे हैं, क्योंकि चुनाव जीतने के बाद भी उन्हें कई तरह के राजनीतिक समीकरणों और गुटबाजी का सामना करना पड़ता है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन से नेता किस वार्ड से अपनी किस्मत आजमाएंगे। फिलहाल, सभी बड़े दावेदार अपने समर्थकों के साथ बैठकें कर रहे हैं और पार्टी आलाकमान के रुख का इंतजार कर रहे हैं। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरक्षण का यह बदलाव किस दल के लिए फायदेमंद साबित होता है और कौन से दिग्गज नेता चुनावी दौड़ से बाहर होते हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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