जयपुर नगर निगम चुनाव: भाजपा-कांग्रेस के सामने अपनों की चुनौती, 35 से ज्यादा वार्डों में बागी बिगाड़ सकते हैं खेल

मोहम्मद नवेद
एडिटर

अपनों से ही घिरे प्रमुख दल
जयपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला होने की उम्मीद थी, लेकिन अब दोनों ही दल अपने ही बागी नेताओं के कारण मुश्किल में फंस गए हैं। 150 वार्डों में कुल 953 निर्दलीय उम्मीदवार चुनावी मैदान में डटे हुए हैं। इनमें से 35 से अधिक वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के वे नेता और पूर्व पार्षद शामिल हैं, जिन्हें पार्टी से टिकट नहीं मिल पाया था। इन बागियों की मौजूदगी दोनों प्रमुख दलों के लिए वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने का खतरा पैदा कर रही है।
पार्टी आलाकमान ने डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज कर दी है। नाम वापसी की अंतिम तिथि 3 सितंबर है, जिसके चलते अब बागियों को मनाने के लिए केवल कुछ ही घंटों का समय बचा है। भाजपा ने बागियों को शांत करने के लिए विशेष टीमों का गठन किया है, जबकि कांग्रेस ने अपने स्थानीय पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं को इस काम में लगाया है ताकि वे नाराज कार्यकर्ताओं को समझाकर मैदान से हटा सकें।
भाजपा के सामने कई वार्डों में संकट
भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर काफी असंतोष देखा जा रहा है। वार्ड 53 में मोहित टेलर को टिकट न मिलने पर उन्होंने बगावत कर दी है। वहीं, वार्ड 13 में पूर्व पार्षद रणवीर सिंह राजावत ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसी तरह वार्ड 16 में दो बार के पार्षद दिनेश कांवट ने न केवल खुद बगावत की है, बल्कि वार्ड 8 से अपनी पत्नी को भी चुनावी मैदान में उतार दिया है, जिससे पार्टी की मुश्किलें दोगुनी हो गई हैं।
पार्टी के अन्य वार्डों में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। वार्ड 15 में पंकज गोयल और तरुण खटोड़, वार्ड 47 में पूर्व पार्षद जय वशिष्ठ, और वार्ड 104 में जिला महामंत्री अरुण खटोड़ जैसे वरिष्ठ नेताओं का निर्दलीय चुनाव लड़ना पार्टी के लिए चिंता का विषय है। वार्ड 113 और 114 में प्रदेश अल्पसंख्यक मोर्चे के सदस्य मुश्ताक अहमद का नामांकन भी पार्टी की रणनीतियों में बाधा डाल रहा है।
कांग्रेस में भी बगावत के सुर
कांग्रेस भी इस आंतरिक कलह से अछूती नहीं है। वार्ड 146 में पप्पू कुरैशी की पत्नी को टिकट दिए जाने के बाद निवर्तमान पार्षद शबनम इलियास खान ने बगावत कर दी है। वार्ड 130 में जितेंद्र सिंह जादौन और पारस मीणा जैसे नेताओं ने पार्टी के खिलाफ निर्दलीय पर्चा भरा है। इसके अलावा वार्ड 50 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव विक्रम वाल्मीकि और वार्ड 109 में गुलाब नबी के बेटे शहजाद नबी का बागी तेवर पार्टी के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
इन बागियों के कारण कई वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है। यदि ये उम्मीदवार नाम वापसी के अंतिम समय तक मैदान में बने रहते हैं, तो इसका सीधा असर दोनों दलों के जीत के समीकरणों पर पड़ेगा। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बागी प्रत्याशियों का प्रभाव उन वार्डों में अधिक होगा जहाँ जीत-हार का अंतर बहुत कम रहता है।
नाम वापसी का अंतिम अवसर
3 सितंबर की दोपहर तक का समय दोनों दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पार्टी नेतृत्व अब बागियों को मनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। इसमें उन्हें भविष्य में पद देने का आश्वासन देने से लेकर पार्टी अनुशासन का हवाला देने तक के तरीके अपनाए जा रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने बागी नेता पार्टी के दबाव में आकर अपना नामांकन वापस लेते हैं और कितने चुनाव लड़ने पर अड़े रहते हैं।
आगामी घंटों में होने वाली बातचीत का परिणाम ही तय करेगा कि नगर निगम चुनाव में मुख्य मुकाबला कितना कड़ा होगा। यदि बागी मैदान से नहीं हटते हैं, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों को अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। फिलहाल, दोनों ही दलों के लिए अपने घर को व्यवस्थित करना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!