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जयपुर: बड़ी चौपड़ पर 79 साल से कायम है सत्ता और विपक्ष के ध्वजारोहण की अनूठी परंपरा

राजधानी जयपुर में स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और देशभक्ति के माहौल में मनाया जा रहा है। सुबह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सिविल लाइंस स्थित मुख्यमंत्री निवास पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जबकि प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने तिरंगे को सलामी दी।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

15 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
जयपुर: बड़ी चौपड़ पर 79 साल से कायम है सत्ता और विपक्ष के ध्वजारोहण की अनूठी परंपरा
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जयपुर की ऐतिहासिक बड़ी चौपड़ पर दिखी देशभक्ति की अनूठी मिसाल

राजधानी जयपुर में स्वतंत्रता दिवस का पर्व पूरे उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। शहर के हृदय स्थल मानी जाने वाली बड़ी चौपड़ पर इस वर्ष भी एक अनूठी राजनीतिक परंपरा देखने को मिली, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एक ही स्थान पर अलग-अलग दिशाओं में ध्वजारोहण किया। इस कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने तिरंगा फहराया, जबकि प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने ध्वज को सलामी दी।

जयपुर की यह परंपरा देश के अन्य हिस्सों से काफी अलग है। जहां अधिकांश राज्यों में राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन सरकारी परिसरों या विधानसभाओं तक सीमित रहते हैं, वहीं जयपुर में मुख्यमंत्री से लेकर विपक्ष के नेता तक खुले चौक में आम जनता के बीच तिरंगा फहराते हैं। यह 79 साल पुरानी परंपरा न केवल शहर की पहचान है, बल्कि देश के जीवंत लोकतंत्र का एक बड़ा प्रतीक भी मानी जाती है।

1947 से चली आ रही है गौरवशाली विरासत

इतिहासकारों के अनुसार, इस परंपरा की नींव 15 अगस्त 1947 को पड़ी थी। आजादी के दिन तत्कालीन राज्य प्रमुख टीकाराम पालीवाल ने बड़ी चौपड़ पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। उस समय राजपरिवार के सदस्यों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया था। इसके बाद कांग्रेस नेता गोकुलभाई भट्ट ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया, जो आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है।

इस परंपरा के पीछे एक विशेष दिशा-निर्देश भी है। मान्यता के अनुसार, सत्तारूढ़ दल पूर्वमुखी होकर ध्वजारोहण करता है, जिसे उगते सूर्य का प्रतीक माना जाता है। वहीं, विपक्ष दक्षिणमुखी होकर तिरंगा फहराता है। यह विशिष्ट प्रक्रिया वर्षों से चली आ रही है और इसे राजनीतिक संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान के रूप में देखा जाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक इतिहास से जुड़ा नाता

बड़ी चौपड़ पर ध्वजारोहण की जड़ें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी देखी जा सकती हैं। उस दौर में आजाद मोर्चा और स्थानीय युवाओं ने यहां तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी थी। महाराजा कॉलेज के छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने इस स्थान को राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बना दिया था। समय के साथ यह स्थान राजनीतिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गया।

इस परंपरा से जुड़े कई रोचक किस्से भी हैं। वर्ष 1968 में जब प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर था, तब भी ज्योतिषीय सलाह और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच इस परंपरा का निर्वहन किया गया था। 2001 तक जब विधानसभा सवाई मानसिंह टाउन हॉल में स्थित थी, तब तक बड़ी चौपड़ राजनीतिक प्रदर्शनों का भी मुख्य केंद्र हुआ करती थी। हालांकि, विधानसभा के लालकोठी स्थानांतरित होने के बाद यहां की राजनीतिक हलचल कम हुई, लेकिन ध्वजारोहण की गरिमा आज भी बरकरार है।

लोकतंत्र की जीवंत मिसाल

बड़ी चौपड़ पर होने वाला यह आयोजन केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि राष्ट्रीय ध्वज किसी भी दलगत राजनीति से ऊपर है। सत्ता और विपक्ष का एक ही चौक पर अलग-अलग ध्वजारोहण करना यह दर्शाता है कि लोकतंत्र की असली ताकत आम नागरिकों के बीच ही निहित है। जयपुर की यह गौरवशाली विरासत आज भी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती प्रदान कर रही है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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