मध्य प्रदेश में बीमा दावों को लेकर विवादों में भारी उछाल, 5 साल में शिकायतों का आंकड़ा 631% बढ़ा
पॉलिसी बेचते समय कैशलेस का वादा करने वाली कंपनियां क्लेम के वक्त नियम-शर्तों की ऐसी बारीक लाइनें सामने रख देती हैं कि उपभोक्ता खुद को ठगा सा महसूस करता है। अपनी ही गाढ़ी कमाई के पैसों के लिए दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर परेशान हो चुके उपभोक्ता अब हार मानकर लोकपाल और अदालतों की शरण ले रहे हैं।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

मध्य प्रदेश में बीमा कंपनियों की मनमानी और दावों के निपटारे में हो रही देरी से आम उपभोक्ता बुरी तरह परेशान हैं। हाल ही में लोकसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों ने बीमा क्षेत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्य में बीमा से जुड़ी शिकायतों में 631.71% की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। पॉलिसी खरीदते समय कैशलेस इलाज और त्वरित भुगतान का वादा करने वाली कंपनियां क्लेम के समय नियमों की जटिल शर्तें सामने रखकर उपभोक्ताओं को परेशान कर रही हैं।
पांच वर्षों में शिकायतों का ग्राफ
बीमा लोकपाल के पास दर्ज आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति चिंताजनक है। वर्ष 2021-22 में प्रदेश से केवल 369 शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जो अगले ही वर्ष 2022-23 में बढ़कर 913 हो गईं। इसके बाद शिकायतों का सिलसिला तेजी से बढ़ा और 2023-24 में यह संख्या 2,405 तक पहुंच गई। वर्ष 2025-26 के ताजा आंकड़ों के अनुसार, यह आंकड़ा अब 2,700 तक पहुंच चुका है। शिकायतों में यह भारी उछाल स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनियों के प्रति उपभोक्ताओं का भरोसा लगातार कम हो रहा है।
जब कंपनियां बिना ठोस आधार के दावों को खारिज कर देती हैं, तो उपभोक्ताओं के पास लोकपाल या उपभोक्ता अदालतों की शरण लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। राष्ट्रीय स्तर पर भी अदालतों में पहुंचने वाले विवादित मामलों की संख्या 2021-22 के 19,025 से बढ़कर 2025-26 में 46,122 हो गई है। मध्य प्रदेश में ही इस वर्ष लोकपाल ने 1,745 मामलों का निपटारा सीधे तौर पर पॉलिसी धारकों के पक्ष में किया है, जो कंपनियों की गलत कार्यप्रणाली को प्रमाणित करता है।
देश में तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश
बीमा दावों के रिजेक्शन और विवादों के मामले में मध्य प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में शामिल हो गया है। लोकसभा रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र इस सूची में पहले स्थान पर है, जहां 7,333 शिकायतें दर्ज की गईं। गुजरात 4,181 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि मध्य प्रदेश 2,700 शिकायतों के साथ तीसरे स्थान पर बना हुआ है। उत्तर प्रदेश, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है, जहां हजारों उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उपभोक्ता आयोग ने हाल ही में बीमा कंपनियों को कड़ी चेतावनी दी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल 'बीमारी छिपाने' का आरोप लगाकर क्लेम खारिज करना अब संभव नहीं होगा। कंपनियों को अपने दावों को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजी सबूत पेश करने होंगे। यदि कंपनी यह साबित करने में विफल रहती है कि बीमित व्यक्ति ने जानबूझकर जानकारी छिपाई थी, तो क्लेम रोकना 'सेवा में कमी' माना जाएगा और कंपनी को हर्जाना देना होगा।
कानूनी संरक्षण और भविष्य की राह
पिछले पांच वर्षों में अदालतों द्वारा उपभोक्ताओं के पक्ष में दिए गए फैसलों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 25,418 से अधिक फैसले ग्राहकों के हक में आए हैं। यह कानूनी जीत यह दर्शाती है कि बीमा कंपनियों द्वारा अपनाई जा रही रिजेक्शन की प्रक्रिया अक्सर मनमानी और अनुचित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को पॉलिसी लेते समय बारीक शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और किसी भी तरह की विसंगति होने पर तुरंत लोकपाल से संपर्क करना चाहिए।
बीमा क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए नियामक संस्थाओं को भी अब और अधिक सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। उपभोक्ताओं का बढ़ता हुआ आक्रोश और अदालतों में लंबित मामलों का अंबार इस बात का संकेत है कि बीमा कंपनियों की कार्यप्रणाली में आमूलचूल सुधार की जरूरत है। आने वाले समय में यदि कंपनियों ने अपनी सेवा शर्तों और दावों के निपटारे में सुधार नहीं किया, तो कानूनी विवादों का यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!