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इंदौर: 700 से अधिक मामलों में 'पॉकेट गवाह' का खेल, टीआई को डिमोट कर बनाया गया एसआई

जमीन विवाद को लेकर पहुंची थी डीआईजी तक शिकायत, फिर शुरू हुई पाॅकेट गवाहो की जांच। तत्कालीन एसीपी से हुआ था टीआई का विवाद।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

7 अगस्त 20262 मिनट पढ़ें
इंदौर: 700 से अधिक मामलों में 'पॉकेट गवाह' का खेल, टीआई को डिमोट कर बनाया गया एसआई
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इंदौर पुलिस में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल: 'पॉकेट गवाह' विवाद में टीआई पर गिरी गाज

इंदौर पुलिस विभाग में उस समय हड़कंप मच गया जब एक गंभीर विभागीय जांच के बाद तत्कालीन खजराना टीआई और वर्तमान साइबर थाना प्रभारी दिनेश वर्मा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई। पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने उन्हें इंस्पेक्टर (टीआई) के पद से पदावनत (डिमोशन) कर सब-इंस्पेक्टर (एसआई) बना दिया है। यह कार्रवाई उनके कार्यकाल के दौरान 700 से अधिक आपराधिक मामलों में एक ही तरह के 'पॉकेट गवाहों' का उपयोग करने के आरोपों के सिद्ध होने के बाद की गई है।

जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जुआ, सट्टा, आबकारी और आर्म्स एक्ट से जुड़े सैकड़ों मामलों में इरशाद और नवीन नामक दो व्यक्तियों को बार-बार सरकारी गवाह के रूप में पेश किया गया था। इन मामलों में से करीब 80 प्रतिशत में आरोपियों को सजा भी हो चुकी है, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद खुला राज

इस पूरे प्रकरण की जड़ें करीब छह महीने पहले चंदन नगर के तत्कालीन टीआई इंद्रमणि पटेल से जुड़े मामले से जुड़ी हैं। उस समय अनवर हुसैन नामक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में आपत्ति जताई थी कि पुलिस ने चार अपराधों के बदले सात अपराध दर्ज किए हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश भर में 'पॉकेट गवाहों' के इस्तेमाल की जांच के निर्देश दिए थे। इसी प्रक्रिया के तहत तत्कालीन एसीपी जयंत राठौर ने दिनेश वर्मा के खिलाफ जांच फाइल तैयार की थी।

जांच के दौरान दिनेश वर्मा ने अपने बचाव में पुलिस विभाग द्वारा पूर्व में सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक हलफनामे का हवाला दिया। उस हलफनामे में तर्क दिया गया था कि गवाह न मिलने की स्थिति में पुलिस को अक्सर पॉकेट गवाह तैयार करने पड़ते हैं। हालांकि, विभागीय जांच समिति ने इस तर्क को खारिज कर दिया और वर्मा को दोषी मानते हुए डिमोशन की सजा सुनाई।

जमीन विवाद और आपसी खींचतान से शुरू हुई जांच

सूत्रों के अनुसार, दिनेश वर्मा के खिलाफ जांच की शुरुआत एक जमीन विवाद से हुई थी। खजराना टीआई के रूप में तैनात रहने के दौरान उनका तत्कालीन एसीपी जयंत राठौर के साथ विवाद हुआ था। एक पीड़ित परिवार ने डीआईजी कार्यालय में शिकायत की थी, जिसके बाद एसीपी को संदेह हुआ कि यह शिकायत टीआई की शह पर की गई है। इसके बाद ही एसीपी ने वर्मा के पुराने मामलों की फाइलें खंगालनी शुरू कीं, जिसमें पॉकेट गवाहों का बड़ा खेल सामने आया।

इस मामले में अब यह भी चर्चा है कि दिनेश वर्मा इस विभागीय सजा के खिलाफ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष अपील कर सकते हैं या फिर कानूनी राहत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने इंदौर पुलिस की साख और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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