दमोह: 17 साल बाद बेगुनाह साबित हुए तीन भाई, हाईकोर्ट ने हत्या के झूठे केस में सजा रद्द की
वो दिन हम कभी नहीं भूल सकते, उस समय मेरी उम्र 16 साल थी। आखिरकर 17 साल बाद न्याय मिला और हम तीनों भाई बेगुनाह साबित हुए, पर दुख यह है कि इस झूठी लड़ाई में घर,मकान,जमीन सब बिक गया।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

17 साल का लंबा संघर्ष और अंततः न्याय की जीत
दमोह जिले के मड़ियादो क्षेत्र में 17 साल पहले दर्ज हुए एक हत्या के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तीन भाइयों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए तीनों भाइयों को बेगुनाह करार दिया है। वर्ष 2009 में हुई इस घटना के बाद से ही पीड़ित परिवार कानूनी दांव-पेच और पुलिस की कथित लापरवाही के बीच पिस रहा था। इस लंबी लड़ाई में परिवार ने न केवल अपने कीमती साल खोए, बल्कि कानूनी खर्चों के चलते अपनी जमीन और मकान तक गंवा दिए।
क्या था पूरा मामला और कैसे फंसा परिवार
मामला 25 अगस्त 2009 की रात का है, जब पड़ोसी प्यारेलाल की उनके अपने बेटे घनश्याम के साथ हुए विवाद के दौरान मौत हो गई थी। आरोप है कि विवाद के दौरान बेटे ने ही पिता पर चाकू से हमला किया था। हालांकि, मृतक के परिजनों ने पड़ोस में रहने वाले तुलसीराम, मोहनलाल और हरप्रसाद पर हत्या का आरोप मढ़ दिया। तुलसीराम का कहना है कि उस समय उनकी उम्र महज 16 साल थी, लेकिन पुलिस ने उन्हें बालिग बताकर गिरफ्तार किया और थाने में मारपीट कर जुर्म कबूलने का दबाव बनाया।
वर्ष 2012 में दमोह की निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर तीनों भाइयों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ परिवार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। इस दौरान एक भाई हरप्रसाद को 2014 में जमानत मिली, लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद खेत में काम करते समय बिजली गिरने से उनकी मृत्यु हो गई। शेष भाइयों ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष जारी रखा।
हाईकोर्ट ने पकड़ी पुलिस जांच की गंभीर खामियां
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस जांच और अभियोजन पक्ष के दावों में पांच बड़ी विसंगतियां पाईं। अदालत ने पाया कि एफआईआर लिखने वाले पुलिसकर्मी का कोई अता-पता नहीं था और न ही उसका बयान दर्ज किया गया। इसके अलावा, मृतक के परिजनों और डॉक्टरों के बयानों में विरोधाभास था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिस चाकू को हत्या का हथियार बताया गया, उसकी एफएसएल रिपोर्ट में खून के निशान नहीं मिले। साथ ही, एफआईआर पर मृतक के अंगूठे का निशान होना भी संदेह के घेरे में था, जबकि मृतक हस्ताक्षर करना जानता था।
इन तमाम खामियों को देखते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने माना कि अभियोजन पक्ष अपना केस साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए तीनों भाइयों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
बर्बाद हुई जमा-पूंजी, अब पुलिस पर कार्रवाई की मांग
न्याय मिलने की खुशी के बीच परिवार का दर्द भी छलक पड़ा। तुलसीराम ने बताया कि इस झूठे केस को लड़ने के लिए उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन और घर बेच दिया। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और परिवार को मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ा। परिवार के सदस्यों ने अब मांग की है कि इस झूठी जांच में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
तुलसीराम की मां लक्ष्मीबाई और मोहन की पत्नी चित्राबाई ने कहा कि उन्हें कानून और ईश्वर पर अटूट विश्वास था, जिसके चलते आज वे सम्मान के साथ जी पा रहे हैं। वकील अजय कुमार जैन ने बताया कि पुलिस की लापरवाही ने एक निर्दोष परिवार के 17 साल बर्बाद कर दिए, जो कि एक गंभीर चिंता का विषय है।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!