बांदा: एक करोड़ की लागत से बना नया पुल दो महीने में ही हुआ जर्जर, दरारें देख भड़के ग्रामीण
बांदा में एक करोड़ रुपए से अधिक की लागत से बना नवनिर्मित पुल महज दो महीने में ही सवालों के घेरे में आ गया है। वीडियो में पुल के बीच वाले हिस्से में साफ दरारें नजर आ रही हैं।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में विकास कार्यों की गुणवत्ता पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत से तैयार नवनिर्मित पुल महज दो महीने के भीतर ही दरारें पड़ने से जर्जर स्थिति में पहुंच गया। नरैनी तहसील क्षेत्र के गिरवां चौराहे पर नहर के ऊपर बने इस पुल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पुल के मध्य भाग में स्पष्ट दरारें देखी जा सकती हैं।
मरम्मत के नाम पर लीपापोती का आरोप
वायरल वीडियो में न केवल पुल की दरारें दिखाई दे रही हैं, बल्कि उन दरारों को छिपाने के लिए की गई आनन-फानन में मरम्मत या लीपापोती के निशान भी साफ नजर आ रहे हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि निर्माण में बरती गई लापरवाही को छिपाने के लिए विभाग द्वारा तकनीकी जांच के बजाय केवल ऊपरी तौर पर सीमेंट का लेप लगाकर मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पुल खुरहंड रोड को गिरवां से जोड़ने के लिए पीडब्ल्यूडी द्वारा बनवाया गया था, लेकिन उद्घाटन के कुछ ही हफ्तों बाद इसकी हालत खराब हो गई है।
पुल के निर्माण में हुई इस कथित धांधली को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का तर्क है कि एक करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी धनराशि खर्च होने के बावजूद निर्माण कार्य की गुणवत्ता इतनी खराब कैसे हो सकती है। पुल का उपयोग रोजाना भारी संख्या में छोटे और बड़े वाहनों के साथ-साथ स्थानीय लोग भी करते हैं, जिससे किसी भी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों ने की उच्च स्तरीय जांच की मांग
इस मामले को लेकर ग्रामीणों ने प्रशासन से पूरे निर्माण कार्य की गहन तकनीकी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जांच केवल दरारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पुल के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री और कार्य की निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल होनी चाहिए। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस निर्माण की गुणवत्ता की जांच नहीं की गई, तो भविष्य में यह पुल किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।
स्थानीय निवासियों ने सवाल उठाया है कि सार्वजनिक धन से बने इस पुल की जवाबदेही किसकी है? ग्रामीणों के अनुसार, निर्माण के महज दो महीने के भीतर दरारें आना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और लापरवाही की ओर इशारा करता है। वे चाहते हैं कि विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र टीम पुल का निरीक्षण करे और यह स्पष्ट करे कि क्या यह पुल आवागमन के लिए पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं।
विभाग की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले पर लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के संबंधित कनिष्ठ अभियंता (जेई) से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है। विभाग की इस चुप्पी ने ग्रामीणों के संदेह को और गहरा कर दिया है। फिलहाल, स्थानीय लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि वायरल वीडियो के संज्ञान में आने के बाद प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पीडब्ल्यूडी इस मामले में कोई आधिकारिक जांच बिठाएगा या फिर मामला केवल खानापूर्ति वाली मरम्मत तक ही सीमित रह जाएगा। करोड़ों की लागत से बने इस पुल की मजबूती पर उठे सवाल न केवल निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!