बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर सियासत: कांग्रेस विधायक ने सरकारी आंकड़ों को बताया फर्जी, 22 मौतों का दावा
आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस में भूरिया ने दावा किया कि बालाघाट में कुपोषण, मलेरिया और मीजल्स के कारण 22 आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि सरकारी आंकड़ों में अब तक सिर्फ आठ मौतें दर्ज की जा रही हैं।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों पर गंभीर आरोप
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में आदिवासी बच्चों की असमय मौत का मामला अब राजनीतिक तूल पकड़ता जा रहा है। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और झाबुआ से विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि बालाघाट में कुपोषण, मलेरिया और मीजल्स के कारण अब तक 22 आदिवासी बच्चों की जान जा चुकी है, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में मौतों का आंकड़ा केवल आठ बताया जा रहा है।
डॉ. भूरिया ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आदिवासी बच्चों की जान की कीमत महज 20 हजार रुपये की सहायता राशि तक सीमित कर दी गई है। उन्होंने इसे सिस्टम की विफलता और संवेदनहीनता करार दिया। विधायक के अनुसार, इन मौतों के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों को सुधारने के बजाय सरकार केवल आंकड़ों को छिपाने का प्रयास कर रही है।
पोषण आहार और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
विधायक ने खुलासा किया कि संबंधित आदिवासी क्षेत्रों में पिछले छह महीनों से पोषण आहार वितरण पूरी तरह बंद है। उन्होंने सवाल उठाया कि बच्चों के लिए आवंटित 'टेक होम राशन' आखिर कहां जा रहा है। इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कई गांवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 20 किलोमीटर से अधिक दूर हैं, जिससे समय पर इलाज मिलना असंभव हो जाता है।
टीकाकरण को लेकर भी उन्होंने चिंताजनक आंकड़े पेश किए। भूरिया का दावा है कि इन क्षेत्रों में टीकाकरण कवरेज 80 प्रतिशत से भी कम है, जिसके कारण मीजल्स जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि यदि सार्वभौमिक टीकाकरण का दावा किया जा रहा है, तो जमीनी हकीकत इससे इतनी अलग क्यों है।
विधानसभा में दिए गए सरकारी जवाबों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कुपोषित बच्चों के लिए मात्र 12 रुपये का पोषण आहार निर्धारित है, जो कि अपर्याप्त है। साथ ही, पोषण पुनर्वास केंद्रों में प्रति बच्चा महज 980 रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जो गंभीर रूप से बीमार बच्चों के इलाज के लिए नाकाफी हैं।
बजट के उपयोग और जवाबदेही पर सवाल
डॉ. भूरिया ने बैगा विकास प्राधिकरण के बजट पर भी सवालिया निशान लगाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये का बजट मिलने के बावजूद आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उन्होंने सरकार से मांग की कि आदिवासी क्षेत्रों के लिए जारी बजट और उसके वास्तविक खर्च का श्वेत पत्र जारी किया जाए ताकि जनता को पता चल सके कि पैसा कहां खर्च हो रहा है।
उन्होंने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के छात्रावासों में सांप के डसने से तीन बच्चियों की मौत हो गई, जो आदिवासी हॉस्टलों की जर्जर स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जब देश की राष्ट्रपति और प्रदेश के राज्यपाल स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं, तब ऐसी घटनाओं का होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
अंत में, कांग्रेस विधायक ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच एक विशेष समिति के माध्यम से कराई जाए। उन्होंने स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण और छात्रावासों की व्यवस्था में सुधार के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की अपील की है, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!