अलवर नगर निगम चुनाव: क्रॉस वोटिंग करने वाले पार्षदों पर भाजपा का कड़ा रुख, मेयर पद के लिए नए चेहरों की तलाश
अलवर नगर निगम चुनाव में मेयर की कुर्सी हासिल करने के लिए बीजेपी इस बार हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है। पिछले चुनाव में बहुमत के बावजूद मिली करारी हार से करीब-करीब यह तय है कि पिछली बार क्रॉस वोटिंग का शक झेल रहे पार्षदों को मेयर की दौड़ से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

मेयर पद के लिए भाजपा की नई रणनीति
अलवर नगर निगम चुनाव में मेयर की कुर्सी पर कब्जा जमाने के लिए भारतीय जनता पार्टी इस बार बेहद सतर्कता बरत रही है। पिछली बार मिली अप्रत्याशित हार से सबक लेते हुए पार्टी नेतृत्व ने अपनी चुनावी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया है कि जिन पार्षदों पर पिछली बार क्रॉस वोटिंग करने का संदेह था, उन्हें इस बार मेयर पद की दौड़ से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा अब केवल दो विकल्पों पर विचार कर रही है। पहला विकल्प किसी नए और निष्ठावान चेहरे को मैदान में उतारना है, जबकि दूसरा विकल्प किसी अनुभवी पुराने चेहरे को फिर से मौका देना है जो पिछली बार हार का सामना कर चुके हैं। इन दोनों विकल्पों के बीच पार्टी का शीर्ष नेतृत्व मंथन कर रहा है ताकि इस बार किसी भी तरह की सेंधमारी से बचा जा सके।
पिछली हार और क्रॉस वोटिंग का दंश
वर्ष 2019 के नगर परिषद चुनाव में भाजपा की स्थिति काफी मजबूत थी। उस समय भाजपा के 27 और कांग्रेस के 19 पार्षद जीतकर आए थे, जबकि 19 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। स्पष्ट बहुमत और निर्दलीयों के समर्थन के बावजूद भाजपा के मेयर प्रत्याशी धीरज जैन को हार का सामना करना पड़ा था। उस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बीना गुप्ता को 37 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को केवल 28 वोट ही मिल सके थे।
इस हार के पीछे पार्टी के ही 8 से 10 पार्षदों द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग को मुख्य कारण माना गया था। उस दौरान एक ऑडियो भी वायरल हुआ था जिसमें कथित तौर पर पैसों के लेन-देन की चर्चा थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मेयर चुनाव में भारी धनबल का इस्तेमाल किया गया था। इस कड़वे अनुभव के बाद अब भाजपा किसी भी जोखिम को लेने के मूड में नहीं है।
दिग्गजों के सामने दोहरी चुनौती
भाजपा के दिग्गज नेताओं के लिए इस बार स्थिति चुनौतीपूर्ण है। हार के बाद पार्टी द्वारा गठित जांच समिति ने संदिग्ध पार्षदों की पहचान की थी, जो अब संगठन के रडार पर हैं। इन पार्षदों को टिकट न देना पार्टी की मजबूरी है, लेकिन इसके साथ ही बगावत का डर भी बना हुआ है। यदि पार्टी इन संदिग्ध चेहरों को दरकिनार करती है, तो भीतरघात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
वहीं, यदि किसी ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया जाता है जिस पर क्रॉस वोटिंग का दाग है, तो पार्टी के अन्य निष्ठावान पार्षद विरोध कर सकते हैं। यही कारण है कि पार्टी अब एक ऐसे निर्विवाद चेहरे की तलाश में है जिसे सभी पार्षद स्वीकार कर सकें और जो पार्टी की छवि को साफ-सुथरा बनाए रखे।
आगे की राह और मंथन
अलवर में हाल ही में पार्टी नेताओं और समर्थकों की सक्रियता बढ़ी है, जहां टिकट के दावेदारों ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। पार्टी नेतृत्व अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। प्राथमिकता यह है कि मेयर पद के लिए ऐसा उम्मीदवार चुना जाए जो पार्टी की एकजुटता को बनाए रखे और पिछली हार के इतिहास को दोहराने से रोके।
आगामी दिनों में भाजपा अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाती है या फिर पुराने अनुभवी नेता को एक और मौका देकर चुनावी मैदान में उतारती है। फिलहाल, अलवर की राजनीति में मेयर पद के लिए चल रही यह उठापटक चर्चा का विषय बनी हुई है।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!