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दृष्टिबाधितों के बैकलॉग पदों पर हाईकोर्ट सख्त, 13 साल पुराने आदेश का पालन न होने पर सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित बैकलॉग पदों को भरने के अपने 2013 के आदेश का 13 साल से पालन न होने पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायालय ने पूछा है कि आदेश के बावजूद आरक्षित रिक्तियां क्यों नहीं भरी गईं और अनुपालन रिपोर्ट क्यों नहीं पेश की गई।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

27 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
दृष्टिबाधितों के बैकलॉग पदों पर हाईकोर्ट सख्त, 13 साल पुराने आदेश का पालन न होने पर सरकार से मांगा जवाब
मूल स्रोत

13 साल से लंबित है हाईकोर्ट का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित बैकलॉग पदों को भरने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने वर्ष 2013 में दिए गए अपने आदेश का पालन न होने पर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायालय ने यह जानना चाहा है कि इतने वर्षों तक इन रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया क्यों शुरू नहीं की गई और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने में इतनी देरी क्यों हुई।

यह मामला नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड, उत्तर प्रदेश द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जरिए सामने आया है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए 8 सितंबर की तारीख तय की गई है।

क्या था 2013 का मूल आदेश?

न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 17 जुलाई 2013 को पारित आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि राज्य के सभी सरकारी विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों में दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए आरक्षित एक प्रतिशत बैकलॉग रिक्तियों को छह महीने के भीतर भरा जाए। इसके साथ ही, तत्कालीन मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र के साथ अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया था।

अदालत ने उस समय मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति गठित करने का भी निर्देश दिया था, ताकि भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, 13 साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी न तो समिति ने कोई ठोस कदम उठाए और न ही सरकार की ओर से कोई अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में जमा की गई।

प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल

रजिस्ट्री की रिपोर्ट से यह स्पष्ट हुआ है कि न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी की गई है। इतने वर्षों तक आदेश का पालन न होना प्रशासनिक तंत्र की बड़ी लापरवाही को दर्शाता है। दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित पदों का खाली रहना उनके संवैधानिक अधिकारों के हनन के समान है, जिसे लेकर अब हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

अब राज्य सरकार को यह बताना होगा कि 2013 के आदेश के बाद से अब तक किन कारणों से भर्ती प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में रखा गया। क्या सरकार ने इस दिशा में कोई प्रयास किए या यह मामला पूरी तरह से फाइलों में दबा रहा, इसका जवाब अब सरकार को शपथपत्र के माध्यम से देना होगा।

आगे क्या होगा?

आगामी 8 सितंबर को होने वाली सुनवाई में सरकार को अपना पक्ष रखना होगा। यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो न्यायालय कड़े कदम उठा सकता है। दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए यह एक बड़ी उम्मीद की किरण है कि इतने वर्षों के बाद न्यायपालिका ने इस मामले में फिर से सक्रियता दिखाई है।

इस मामले के निपटारे से न केवल बैकलॉग पदों पर भर्ती का रास्ता साफ होगा, बल्कि सरकारी विभागों में दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित कोटे के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ेगी। अब सभी की निगाहें सरकार के जवाब और न्यायालय के अगले आदेश पर टिकी हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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