एपीओ भर्ती 2025: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरक्षण और मेरिट सूची पर आयोग से मांगा स्पष्टीकरण
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सहायक अभियोजन अधिकारी भर्ती परीक्षा-2025 में आरक्षण एवं मेरिट के आधार पर सामान्य श्रेणी के निर्धारण को लेकर चल रहे विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयोग से स्पष्टीकरण हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने विशेष रूप से यह स्पष्ट करने को कहा है कि प्रारंभिक परीक्षा की मेरिट सूची तैयार करते समय सामान्य श्रेणी में केवल अनारक्षित अभ्यर्थियों को रखा गया था

मोहम्मद नवेद
एडिटर

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) द्वारा आयोजित सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) भर्ती परीक्षा-2025 को लेकर उपजे आरक्षण और मेरिट निर्धारण विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने आयोग से एक विस्तृत और स्पष्ट हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह मामला प्रारंभिक परीक्षा की मेरिट सूची में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में शामिल करने की प्रक्रिया से जुड़ा है।
क्या है पूरा मामला और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति
पंकज कुमार वर्मा और अन्य द्वारा दायर याचिका में आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों में 321 ओबीसी, 131 ईडब्ल्यूएस और 43 एससी श्रेणी के अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी की मेरिट में जगह दी गई है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी अपनी योग्यता के आधार पर अनारक्षित सीट पर चयन का हकदार है, तो उसे आरक्षित कोटे में समायोजित करने के बजाय सामान्य श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आयोग द्वारा पहले दाखिल किए गए हलफनामे को अपर्याप्त माना। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से जानना चाहा है कि प्रारंभिक परीक्षा की मेरिट सूची तैयार करते समय क्या सामान्य श्रेणी में केवल अनारक्षित अभ्यर्थियों को ही रखा गया था, या फिर आरक्षित और अनारक्षित दोनों वर्गों के अभ्यर्थियों को उनकी मेरिट के आधार पर एक साथ रखा गया था।
आयोग का पक्ष और कोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से तर्क दिया गया कि अंतिम चयन के समय नियमों के अनुसार, मेरिट के आधार पर आरक्षित वर्ग के उन अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में माइग्रेट किया जाएगा जिन्होंने सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। आयोग ने स्वीकार किया कि 321 ओबीसी, 131 ईडब्ल्यूएस और 43 एससी अभ्यर्थी ऐसे हैं जिन्होंने सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल किए हैं।
हालांकि, कोर्ट ने आयोग के इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा कि यह जवाब अधूरा है। न्यायालय ने पूछा है कि यदि ये अभ्यर्थी सामान्य श्रेणी के अंतिम अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त कर चुके हैं, तो क्या प्रारंभिक परीक्षा के स्तर पर ही उन्हें सामान्य श्रेणी में रखा गया है या उन्हें अभी भी उनकी आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत ही गिना जा रहा है।
अगली सुनवाई और कानूनी स्थिति
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया है कि वह एक बेहतर और स्पष्ट शपथ पत्र दाखिल करे। कोर्ट ने विशेष रूप से यह बताने को कहा है कि प्रारंभिक परीक्षा के बाद सामान्य श्रेणी की सूची किस आधार पर तैयार की गई है और जिन आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें वर्तमान में किस श्रेणी में रखा गया है।
यह मामला भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और आरक्षण नियमों के सही क्रियान्वयन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यदि प्रारंभिक परीक्षा के स्तर पर ही मेरिट का सही निर्धारण नहीं किया गया, तो पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। अब सभी की निगाहें आयोग द्वारा दाखिल किए जाने वाले नए हलफनामे पर टिकी हैं, जिसके बाद ही कोर्ट इस मामले में कोई ठोस आदेश पारित करेगा।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!