ब्रेकिंग
उदयपुर: पुलिस हिरासत से चकमा देकर भागे दो नाबालिग चोर, पहाड़ियों में तलाश जारीभोपाल के कटारा हिल्स में तेंदुए की दस्तक: रिहायशी इलाकों में दहशत, पार्क में आवाजाही पर लगी रोकग्वालियर में हनीट्रैप का खौफ: ब्लैकमेलिंग से तंग आकर युवक ने की आत्महत्या, दंपति पर केस दर्जलखनऊ: लारी कार्डियोलॉजी सेंटर में हर साल 8500 से ज्यादा हार्ट अटैक मरीजों को मिल रहा नया जीवनसुपौल: अवैध लेनदेन के विवाद में युवक का अपहरण, पुलिस ने 12 घंटे के भीतर सकुशल कराया बरामदकरौली की बेटी प्रिया गुप्ता का कमाल: पहले ही प्रयास में NEET-PG में लहराया सफलता का परचमधौलपुर: पिकअप हादसे में 4 मौतों के बाद प्रशासन सख्त, पोखर किनारे से हटाए गए अवैध निर्माणझांसी के कारोबारी का रहस्यमय परिस्थितियों में निधन, मध्य प्रदेश की नदी में मिला शव
उदयपुर: पुलिस हिरासत से चकमा देकर भागे दो नाबालिग चोर, पहाड़ियों में तलाश जारीभोपाल के कटारा हिल्स में तेंदुए की दस्तक: रिहायशी इलाकों में दहशत, पार्क में आवाजाही पर लगी रोकग्वालियर में हनीट्रैप का खौफ: ब्लैकमेलिंग से तंग आकर युवक ने की आत्महत्या, दंपति पर केस दर्जलखनऊ: लारी कार्डियोलॉजी सेंटर में हर साल 8500 से ज्यादा हार्ट अटैक मरीजों को मिल रहा नया जीवनसुपौल: अवैध लेनदेन के विवाद में युवक का अपहरण, पुलिस ने 12 घंटे के भीतर सकुशल कराया बरामदकरौली की बेटी प्रिया गुप्ता का कमाल: पहले ही प्रयास में NEET-PG में लहराया सफलता का परचमधौलपुर: पिकअप हादसे में 4 मौतों के बाद प्रशासन सख्त, पोखर किनारे से हटाए गए अवैध निर्माणझांसी के कारोबारी का रहस्यमय परिस्थितियों में निधन, मध्य प्रदेश की नदी में मिला शव

35 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी आरोपी बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1989 के एक अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के मामले में लगभग 35 साल बाद फैसला सुनाते हुए दोषियों की सजा रद्द कर दी है। कोर्ट ने पीड़िता की उम्र को लेकर अभियोजन पक्ष की ओर से पेश सबूतों को अपर्याप्त और असंतोषजनक मानते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है।

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

12 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
35 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी आरोपी बरी
मूल स्रोत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1989 के एक पुराने अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के मामले में तीन दशक से अधिक समय बाद एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों को अपर्याप्त मानते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया है।

क्या था पूरा मामला और निचली अदालत का फैसला

यह मामला बांदा जिले से जुड़ा है, जहां वर्ष 1989 में अपहरण और दुष्कर्म के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 363 और 366 के तहत कार्रवाई की गई थी। बांदा के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश ने 19 नवंबर 1991 को अपना फैसला सुनाते हुए राम चरण और राजा राम को धारा 366 के तहत तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान कुछ आरोपियों की मृत्यु भी हो गई, जिसके बाद अपील केवल जीवित बचे आरोपियों के लिए ही प्रभावी रही।

अपील के दौरान बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से पीड़िता की उम्र को लेकर सवाल उठाए। बचाव पक्ष का तर्क था कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी, इसलिए दुष्कर्म और अपहरण के आरोप सिद्ध नहीं होते। उन्होंने पीड़िता के भाई के बयानों का हवाला दिया, जिसमें उसने पीड़िता की उम्र का आकलन करते हुए उसे परिवार की सबसे छोटी संतान बताया था। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि उम्र निर्धारण में वैज्ञानिक परीक्षणों के बावजूद दो वर्ष का अंतर संभव है, जिसका लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए।

कोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला

न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को लेकर ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा। मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टरों ने अपनी गवाही में उम्र का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया था। इसके अलावा, पीड़िता ने स्वयं अपनी गवाही में जो उम्र बताई थी, वह भी विरोधाभासी थी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।

अदालत ने यह भी गौर किया कि निचली अदालत ने धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपियों से पूछताछ के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का सही पालन नहीं किया था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था। इन तमाम विसंगतियों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए हाईकोर्ट ने बांदा सत्र न्यायालय के 1991 के आदेश को खारिज कर दिया और आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी का प्रभाव

यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली में लंबित मुकदमों की लंबी अवधि को दर्शाता है। घटना के 35 साल बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं पर बहस छेड़ दी है। इतने लंबे समय तक चले मुकदमे के कारण न केवल आरोपियों का जीवन प्रभावित हुआ, बल्कि न्याय मिलने की प्रक्रिया भी अत्यधिक लंबी हो गई। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि साक्ष्यों के सही संकलन और समयबद्ध सुनवाई के अभाव में ऐसे पुराने मामलों में अक्सर संदेह का लाभ आरोपियों के पक्ष में चला जाता है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया है। राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एजीए ने हालांकि पीड़िता के भाई के बयानों और डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता के नाबालिग होने का तर्क दिया था, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना। अंततः, साक्ष्यों की कमी और कानूनी खामियों के चलते 35 साल पुराने इस विवाद का पटाक्षेप हो गया है।

SponsoredMushfan Digital Studios - We Build Brands. We Grow Businesses.

टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

संबंधित खबरें