15 साल का संघर्ष: BDO ने कहा था 'तुम कभी अधिकारी नहीं बनोगे', अब उसी पद पर चयनित हुए दीपक
साल...एक ऐसा सफर जिसमें कभी पीटी में सफलता मिली तो कभी मेंस में, लेकिन इंटरव्यू की दहलीज पर सपना टूटता रहा। आखिरकार बिहार के सीवान के दीपक कुमार ने हार नहीं मानी।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

15 साल की तपस्या और अटूट विश्वास
बिहार के सीवान जिले के रहने वाले दीपक कुमार ने 15 साल के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार प्रशासनिक सेवा में अपनी जगह बना ली है। 70वीं बीपीएससी परीक्षा में सफलता प्राप्त कर वे ग्रामीण विकास पदाधिकारी (RDO) के पद पर चयनित हुए हैं। पटना के बापू सभागार में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें नियुक्ति पत्र सौंपा गया। यह उपलब्धि केवल एक सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि उस लंबी जद्दोजहद का परिणाम है जिसमें उन्होंने कई बार असफलताएं देखीं।
दीपक का सफर 2011 में शुरू हुआ था। इस दौरान उन्होंने दरोगा, रेलवे और बीएसएससी जैसी कई परीक्षाओं में हाथ आजमाया, लेकिन सफलता उनसे दूर रही। बीपीएससी की परीक्षाओं में भी वे कभी प्रारंभिक परीक्षा तो कभी मुख्य परीक्षा या साक्षात्कार के चरण में अटक जाते थे। यह उनका सातवां प्रयास था, जिसके बाद उन्हें यह सफलता हासिल हुई।
अपमान बना प्रेरणा का स्रोत
दीपक के जीवन का एक बेहद भावुक मोड़ वह था जब वे अपने जिले के एक बीडीओ से मिलने गए थे। उस समय उन्हें एक अधिकारी के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। दीपक ने बताया कि जब उन्होंने अपनी तैयारी के बारे में बताया, तो बीडीओ ने तंज कसते हुए कहा था कि वे कभी अधिकारी नहीं बन पाएंगे। उस अपमानजनक टिप्पणी ने दीपक के मन में एक टीस पैदा की, जिसे उन्होंने अपनी ताकत बनाया और आज वे स्वयं उसी पद पर आसीन हैं।
इस कठिन दौर में दीपक के बड़े भाई उनके लिए सबसे बड़े संबल बने। पिछले 15 वर्षों से उनके भाई ने बिना किसी सवाल के आर्थिक मदद जारी रखी। वहीं, उनकी मां ने घर की जिम्मेदारियां संभालीं और पिता ने बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए कर्ज लेकर और खेत गिरवी रखकर पढ़ाई का खर्च उठाया। दीपक के पिता ने बताया कि परिवार पर अभी भी लाखों का कर्ज है, लेकिन बेटे की सफलता ने उन्हें गर्व का अनुभव कराया है।
परिवार और समाज की प्रतिक्रिया
दीपक की सफलता पर उनकी मां सुचिता देवी भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि तीन पीढ़ियों में उनके परिवार में यह पहली सरकारी नौकरी है। जब दीपक के अधिकारी बनने की खबर गांव पहुंची और घर के बाहर पटाखे फोड़े गए, तो पड़ोसियों ने पहले तो इसे किसी समारोह का हिस्सा समझा, लेकिन बाद में सच्चाई जानकर कई लोगों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए। हालांकि, दीपक के माता-पिता के लिए यह क्षण वर्षों के इंतजार का सुखद अंत था।
दीपक का कहना है कि एक अधिकारी को हमेशा विनम्र होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने स्वयं एक आम नागरिक के रूप में अधिकारियों के व्यवहार की उपेक्षा झेली है। अब जबकि वे स्वयं व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, उनका लक्ष्य लोगों की सेवा करना और अपने अनुभव से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है।
दीपक की यह कहानी उन हजारों युवाओं के लिए एक मिसाल है जो सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिता देते हैं। यह साबित करता है कि यदि दृढ़ संकल्प और परिवार का साथ हो, तो 15 साल का लंबा इंतजार भी एक दिन सफलता में बदल सकता है।
आने वाले समय में दीपक अब अपनी नई जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं। उनके पिता ने कहा कि जिस घर में कभी आर्थिक तंगी के कारण रोना पड़ता था, आज वहां खुशी का माहौल है। दीपक का यह सफर धैर्य और निरंतरता की एक नई परिभाषा लिख गया है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!